निकाह की फ़ज़ीलत और मसाइल

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NIKAH KI FAZILAT AUR MASAIL
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NIKAH KI FAZILAT AUR MASAIL

निकाह की फ़ज़ीलत और मसाइल

निकाह की फ़ज़ीलत

निकाह का लुग़वी माना है ऐसा कॉन्ट्रैक्ट जिसके नतीजे में मर्द और औरत एक दूसरे पर हलाल हो जाएँ “निकाह करना सुन्नत है

इसकी हैसियत रखने के बावजूद निकाह न करे वह नबी (sws) के तरीके पर नहीं है

जो शख्स जीना से बचने के लिए निकाह करता है अल्लाह उसकी मदद करता है निकाह न करने से ज़मीन में फसाद पैदा होता है

निकाह करने से जितनी मियां बीवी में मुहब्बत होती है और किसी में नहीं होती, निकाह आधा दीन है मर्दो के लिए औरतों से बढ़कर कोई फितना नहीं”

(मिश्कात 268)

“कुंवारी लड़की से निकाह करना बेहतर है माल व खूबसूरती हसाब नसब का ख्याल न करे बल्कि दीन दार औरत से निकाह करे,

मुसलमान के लिए नेक औरत से बढ़कर और कोई चीज़ नहीं है जिस निकाह में काम खर्च हो उसमे बरकत ज़्यादा होती है,

जिस औरत से निकाह करना चाहता है उसे एक बार देख ले क्योंकि एक बार देखने से मुहब्बत पैदा होगी, निकाह के वक़्त औरत से इज़ाज़त लेना ज़रूरी है

अगर कुंवारी है तो उसका चुप रहना काफी है और तलाक़शुदा को ज़बान से कहना चाहिए,

बिना सरपरस्त के निकाह सही नहीं अगर कोई वाली न हो तो हाकिम वाली है एक आदमी के पैग़ाम के होते दूसरे को पैग़ाम देना मन है”

(मिश्कात 262,266,269,268 )

जिनसे निकाह जाएज़ नहीं:

1- सौतेली माँ

2- सगी माँ

3- बेटी

4-बहन

5- फूफी

6- खाला

7- भतीजी

8- भांजी
9- ढूढ़ वाली माँ (दाई)
10- सास
11- बीवी की बेटी जो पहले शौहर से हो
12- सेज बेटों की बीवी से

13- दो सगी बहनो से एक साथ

निकाह में बीवी और उसकी फूफी को जमा करना (यानी एक साथ इनको निकाह में रखना हराम है) और इसी तरह बीवी व उसकी कह आला का जमा करना भी हराम है,

मुसलमान मर्द का निकाह मुशरिका औरत से और मुसलमान औरत का निकाह मुशरिक मर्द से हराम है,

बेहतर है की मुशरिका के मुकाबले में मुसलमान लौंडी से निकाह करे इसी तरह इमान वाली औरत घुलम से निकाह करे मगर मुशरिक मर्द से निकाह न करे,

(मिश्कात, बुखारी, सौराह निसा)

जवान औलाद की शादी:

“जवान लड़के और लड़कियों का निकाह कर देना चाहिए, हदीस में है अगर लड़की 12 साल की हो गयी हो और उसका निकाह नहीं हुवा और उससे जीना हो गया तो उसका गुनाह बाप पर है,

इसकी तरह जब लड़का बालिग़ हो जाए तो फ़ौरन निकाह कर देना चाहिए वरना अगर जीना कर बैठा तो उसका गुनाह बाप पर होगा”

(मिश्कात 276)

“अगर एक से ज़्यादा बीवियां हो तो उनके बीची नसाफ व बारी मुक़र्रर करना वाजिब है, खिलाने पिलाने व रात गुज़ारने में इन्साफ करना वाजिब है

मगर मुहब्बत में कमी ज़्यादती में कोई पकड़ नहीं

(मिश्कात 276)

अगर पहली बीवी के होते हुवे कुंवारी औरत से निकाह करे तो 7 रात कुंवारी के पास रहे फिर बारी मुक़र्रर करे,

और शादी शुदा औरत को कुंवारी पर करे तो 3 रात उसके पास रहकर बारी मुक़र्रर करे, अगर औरतों के साथ इन्साफ न करेगा तो

क़यामत के दिन इस हालत में अल्लाह के साममे लाया जाएगा की उसका आधा जिस्म गिरा होगा

और औरतों का मर्द पर हक़ है की जो खाये वैसा ही खिलाये जैसा पहले वैसा ही पहनाये इसके मुंह पर न मारे,

बुरा न कहे, नाराज़गी की सूरत में घर से बहार न सोये अगर ज़रूरत पेश आये तो मामूली से मार मारे, ज़बान दराज़ है तो तलाक़ दे दे”

(तिर्मिज़ी, मिश्कात 279)

अल्लाह हमे कहने से ज्यादा सुनने से ज्यादा अमल करने की तौफ़ीक़ आता फरमाए…आमीन

इकरम

निकाह और तलाक़ के मसाइल

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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