नमाज़ो की क़ज़ा का बयान

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Namazo Ki Qaza Ka BayanDaily
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नमाज़ो की क़ज़ा का बयान

मसायल1: किसी इबादत को इस के मुक़र्रर वक़्त पर अदा करने को “अदा” कहते है

और वक़्त गुज़र जाने के बाद अमल करने को “क़ज़ा कहते है.

मसायल 2: फ़र्ज़ नमाज़ो की क़ज़ा फ़र्ज़ है– इतर की क़ज़ा वाजिब है–

फजर की सुन्नत अगर फ़र्ज़ के साथ क़ज़ा हुई और ज़वाल से पहले पढ़े

तो फ़र्ज़ के साथ सुन्नत भी पढ़े– और अगर ज़वाल के बाद पढ़े तो सुन्नत की क़ज़ा नहीं.

जुमाह और ज़ोहर की सुन्नते क़ज़ा हो गयी, और फ़र्ज़ पढ़ लिया

अगर वक़्त खत्म हो गया तो इन सुन्नतों की क़ज़ा नहीं और अगर वक़्त बखी है तो इन सुन्नतों को पढ़े

और अफ़ज़ल ये है के पहले फ़र्ज़ के बाद वाली सुन्नतों को पढ़े फिर इन छूटी हुई सुन्नतों को पढ़े.

(दर्रे मुख़्तार,जिल्द1, सफ़ा 488, जन्नती ज़ेवर 212)

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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