क्या गैर रमजान में तरावीह तहज्जुद की नमाज़ को कहा गया है?

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kya Gair Ramzan mein tarawih Tahajjud Ki Namaz Ko Kaha gaya Hai?
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kya Gair Ramzan mein tarawih Tahajjud Ki Namaz Ko Kaha gaya Hai?

तरावीह के फ़ज़ाइल और मसाइल

क्या गैर रमजान में तरावीह तहज्जुद की नमाज़ को कहा गया है?

तहज्जुद अलग नमाज़ है जो के रमजान और गैर रमजान दोनों में मस्नून है, तरावीह सिर्फ रमजान उल मुबारक की इबादत है,

तहज्जुद और तरावीह को एक नमाज़ नहीं कहा जा सकता, तहज्जुद की रकअत भी 4 से 12 तक है, दरमियाना दर्जा 8 रकअत है,

इसलिए 8 रकअत तहज्जुद को तरजीह दी गयी,

अगर कोई शख्स बिमारी की वजह से रोज़ा न रखे तो ऐसे शख्स की तरावीह का क्या बनेगा वो तरावीह पढ़ेगा या नहीं?

जो सख्श बिमारी की वजह से रोज़ा की ताक़त न रखता हो और तरावीह पढ़ने की ताक़त हो तो तरावीह ज़रूर पढ़नी चाहिए,

तरावीह बा-जमाअत पढ़ना कैसा है.?

अगर तरावीह मस्जिद में जमाअत के साथ न पढ़ी जाये तो क्या गुनाह होगा??

रमजान उल मुबारक में मस्जिद में तरावीह की नमाज़ होना सुन्नते किफ़ाया है,

अगर कोई मस्जिद तरावीह की जमाअत से खाली रहेगी तो सारे मोहल्ले वाले गुनहगार होंगे,

(आपके मसाइल और उनका हल, 3/30)

कुछ लोग कहते है, नमाज़े तरावीह का आगाज़ एक इज्तिहाद के तहत हज़रत उम्र रज़ियल्लाहु अन्हु ने किया था!

अगर ये दुरुस्त है तो फिर नमाज़े तरावीह सुन्नत कैसे हुई?

नमाज़े तरावीह को इज्तिहाद कहना एक गलत इज्तिहाद है,

नमाज़े तरावीह की तरग़ीब खुद हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से साबित है,

और तरावीह का जमाअत से अदा करना भी आप(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से साबित है,

मगर इस अंदेशा से के कही ये उम्मत पर फ़र्ज़ न हो जाये आप(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने जमाअत का अहतमाम तर्क फार्मा दिया,

हज़रत उम्र फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु अन्हु के ज़माने में चूँकि अब ये अंदेशा नहीं रहा था, इसलिए इस सुन्नत जमाअत को दोबारा जारी किया गया,

इसके अलावा” खुलफ़ा ए राशिदीन ” रज़ियल्लाहु अन्हुम की इक़्तेदा का लाज़िम होना शरीयत का एक मुस्तकिल उसूल है,

अगर बिल- फ़र्ज़ तरावीह की नमाज़ हज़रत उम्र रज़ियल्लाहु अन्हु ने इज्तेहाद ही से जारी की होती तो चुकी तमाम सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम ने इसको बिला एतराज क़ुबूल कर लिया,

और बाद के खुलफ़ा ए राशिदीन रज़ियल्लाहु अन्हुम (हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हु, हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु) ने इस पर अमल किया,

इसलिए बाद के किसी शख्श के लिए इज्मा ए सहाबा रज़ियल्लाहु अन्हुम और सुन्नते खुलफ़ा ए राशिदीन रज़ियल्लाहु अन्हुम की मुखालफत की कोई गुंजाइश नहीं रही,

यही वजह है के अहले हक़्क़ में से कोई एक भी तरावीह के सुन्नत होने का मुनकिर नहीं,

(आपके मसाइल और उनका हल, 3/31)

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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