जानिए मज़लूम को तकलीफ़ देने की सज़ा क्या है, पढ़िए ये हदीस

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Mazloom Ko Takhleef Dene Ki Saza
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Mazloom Ko Takhleef Dene Ki Saza

मज़लूम को तकलीफ़ देने की सज़ा

रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया की

मज़लूम यानी कमज़ोर की बददुआ से बचो । अगरचे मज़लूम काफ़िर ही हो ।

फायदा :

इस हदीस शरीफ़ से साबित हुआ की किसी मुसलमान को बल्कि काफ़िर को भी नाहक़ तकलीफ़ देना और सताना दरुस्त नहीं क्योंकि मज़लूम कमज़ोर और बेकस होता है । उस की बददुआ तीर की तरह लगती है इसलिए जुल्म व सितम से बचना जरुरी है ।

(बाग़े – जन्नत यानी ख़ुदाई बाग़, सफा न० 103)

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)

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