क्या हया (शर्म) ईमान का हिस्सा है? पढ़िये एक हदीस

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हया (शर्म) ईमान का हिस्सा है।

अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि. से रिवायत है

कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्ल्म एक अन्सारी आदमी के पास से गुज़रे,

जबकि वह अपने भाई को समझा रहा था कि तू इतनी शर्म क्यों करता है?

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्ल्म ने उससे फ़रमाया:

“उसे अपने हाल पर छोड़ दो, क्यूंकि शर्म तो ईमान का हिस्सा है।”

(मुख़्तसर सहीह बुखारी, सफ़ा न० 30)

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)

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