हज-ए-मक़बूल का एक अजीब किस्सा, जानिए

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Haj-E-Maqbul Ek Ajeeb Kissa
Makkah
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Haj-E-Maqbul Ek Ajeeb Kissa

हज-ए-मक़बूल का एक अजीब किस्सा

अज़रात अब्दुल्लाह इब्ने मुबारक बग़दाद में एक बुजुर्ग थे। वह हज के लिए खाना हुए।

रास्ते में देखा कि एक औरत बुर्क़ा ओढ़े हुए कूड़े पर से मरे हुए कुत्ते के गोश्त का टुकड़ा ले चली।

आपने उससे पूछा कि इस गोश्त को क्या करोगी। कहा कि हम तीन दिन कि भूख से मजबूर हो गये और बच्चे बेचैन है और मेरा आदमी बीमार है। तंगदस्ती बहुत है।

भूख दूर करने के लिए यह गोश्त ले जाती हूँ।

यह सुनकर उन बुज़ुर्ग को अफ़सोस हुआ और बीबी से फ़रमाया कि इस गोश्त को डाल दो और मुझे अपने घर ले चलो।

मैं इंशाअल्लाहतआला तुम्हारी मदद करूँगा। वह उनको अपने घर ले गयी।

जाकर देखा तो वाक़ई बच्चे भूख कि वजह से बेहोश पड़े हैं और उनका बाप बीमार है।

उन बुज़ुर्ग ने जो रूपया उनके पास था, उसको दे दिया

और फ़रमाया अपना पेट भरे। कपडे बनाकर अपना बदन ढको और कोई कारोबार कर लेना।

यह नसीहत करके आप बे हज किये हुए वापस अपने घर आ गये।

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लिखा है कि उस आदमी को खुदा ने शिफा बख्शी। उसने फिर कारोबार लिखा।

अल्लाहतआला ने उन बुज़ुर्ग कि बरकत से उसको खुशहाल कर दिया।

सुबहान अल्लाह! गरीबों पर रहम करना और उनको मदद करना अल्लाह तआला को बहुत पसन्द है।

इस अमल और कारे खैर की बरकत यह ज़ाहिर हुई की जिस रोज़ हज हुआ तो अरफ़ात के मैदान में खुदा की तरफ़ से हाजियों को ग़ैब से यह आवाज़ आयी कि-ऐ हाजियों!

अब्दुल्लाह इब्ने मुबारक का हज हमने क़बूल किया और उनकी बरकत से तुम सबका हज क़बूल किया।

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फ़ायदा-

मुसलमानों! याद रखो हज भी तो अल्लाहतआला को खुश करने के लिए करते हैं।

बस हर मौके पर इसका खयाल होना चाहिए कि माल खर्च करने की कहाँ जरुरत है।

आजकल बाज़ लोग हज पर हज तो करेंगे मगर किसी गरीब मुसलमान भाई की खबर नहीं की लेंगे।

चाहे कोई कैसा ही ग़रीब और तंगदस्त हो। मर्ज़ में क़र्ज़ में दबा हुआ हो। मकान रहने को न हो।

रहमत-ए-दोजहाँ दस्तगीर-ए बेकसां हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया की-

जो मुसलमान किसी ग़रीब मुसलमान को कपडे पहनाये तो अल्लाहतआला उसको जन्नत के सब्ज रेशमी कपडे पहनाये

और जो मुसलमान किसी भूखे मुसलमान को खाना खिलायेगा तो अल्लाहतआला उसको जन्नत के मेवे खिलायेगा

और जो मुसलमान किसी प्यासे मुसलमान को पानी पिलायेगा अल्लाहतआला उसको जन्नत की शराब-ए-पाक पिलायेगा।

(तिरमिजी)

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फ़ायदा-

ग़रीब दीनदारी और सफदपोशा लोगों का ज़्यादा ख़्याल रखा जाये ताकि जो वाक़ई ग़रीब हों

और अपनी गरीबी छुपाते हों किसी से मांगता न हों खूब देखभाल कर ऐसे लोगों की मदद करना निहायत मुबारक अमल है।

याद रखो, अगर मालदार लोग गरीबों का हक़ अदा न करेंगे तो हकूमत के टैक्स बग़ैरा या किसी

और सूरत से माल निकल जायेगा और खुदा-ए-तआला की पूछगछ सर पर रहेगी।

(बागे-जन्नत यानी ख़ुदाई बाग़, सफा न० 274)

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)

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6 COMMENTS

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