रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है हज मक़बूल की निशानियाँ, जानिए

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Hajj Makbool ki Nishaniyan
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Hajj Makbool ki Nishaniyan

हज मक़बूल की निशानियाँ,

बड़े-बड़े आलिमों ने फ़रमाया है कि-

हज्र-ऐ अस्वद में कसौटी की-सी खासियत है-यानी उसमें यह असर है कि उसके छूने या चूमने के बाद जैसा आदमी होता है

उसकी हालत ज़ाहिर हो जाती है। बाज़ लोग हज से पहले मालूम नहीं होते कि यह अन्दर से कैसे हैं हज के बाद छुपा रहना मुश्किल है।

असल हालत ज़रूर खुल जाती है।

बस जिसकी हालत हज के बाद पहले से अच्छी हो जाये तो समझना चाहिए कि

उसका हज क़बूल हो गया और जिसकी हालत पहले से बुरी हो जाये तो उसका हज खतरे में है

तो मुमकिन है कि बाज़ लोग यह ख्याल करें कि फिर हज न करना चाहिए तकि क़लई न खुले।

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इसका जवाब यह है कि हज न करने में ज्यादा खतरा है।

क्योंकि हदीस शरीफ में आया है कि-जिस शख्श पर हज फ़र्ज़ हुआ वह फिर भी हज न करे तो खुदा को इसकी परवाह नहीं है।

चाहे वह यहूदी होकर मरे या नसरानी होकर मरे।

बस अगर हज न किया तू बुरे खत्मे का डर है और हज करने में तो यही डर है कि कलाई खुल जाएगी।

वह भी वक़्त की उसके अदबों में कमी की जावे।

वरना अकसर यही होता है कि शौक और मुहब्बत के साथ जो हज अदा किया जाता है

उसकी बरकत से दीनदारी बढ़ जाती है।

बस हज करने वाले को चाहिए कि पहले किसी अल्लाह वाले से इसके आदाब मालूम करे।

गरज़ कि हज मुक़बल की निशानियाँ है कि हज करने के बाद नफरत और बेरगबती दिल में पैदा हो।

अच्छे कामों के करने का शौक पैदा हो और बुरे कामों से नफरत पैदा हो और हज करने का फिर दोबारा भी शौक बाक़ी रहे।

रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है कि जिस मर्द या औरत ने खास अल्लाह कि रज़ामन्दी के लिए

और उसका हुक्म समझकर हज किया और बुरी गरज़ों से बचा रहा

तो गुनाहों से ऐसा पाक होकर वापस आता है जैसे अपनी माँ के पेट से बेगुनाह पैदा हुआ था।

(बुखारी शरीफ)

(बाग़े-जन्नत यानी ख़ुदाई बाग़, सफा न० 273)

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