सल्लल्लाहु अलैहि वसल्ल्म ने फ़रमाया तकलीफ़ ख़ुदा की रेहमत है

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तकलीफ़ ख़ुदा की रेहमत है
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तकलीफ़ ख़ुदा की रेहमत है

तकलीफ़ ख़ुदा की रेहमत है

इरशाद फ़रमाया रसूल अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्ल्म) ने कि-

जिसके साथ अल्लाहतआला बेहतराई करना चाहता है तो उसको किसी तकलीफ़ में डाल देता है।

(बुख़ारी शरीफ़)

फ़ायदा-

इस हदीस शरीफ से मालूम हुआ कि मुसलमानों को चाहिए कि तकलीफ़ में ज़्यादा परेशान न हों।

तकलीफ़ को ख़ुदा का गज़ब न समझे बल्कि उसको ख़ुदा कि रहमत समझें क्योंकि तकलीफ़ में गुनाह माफ़ होते हैं,

दर्जे बुलन्द होते हैं, खुदा की मारफ़त बढ़ती है। खुदा याद आता है, आजिज़ी पैदा होती है और बड़ाई दिल से निकल जाती है।

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ऐशो-आराम, माल व दौलत में इन्सान ख़ुदा को भूल जाता है। अपने आपको बड़ा समझने लगना है। अगर तकलीफ़ ख़ुदा की रहमत न होती तो वह नाबियों को और वलियों को तकलीफ़ में न डालता। ख़ूब याद रखो कि सबसे बड़ी तकलीफ़ की बात यह है कि इन्सान ख़ुदा को भूल जाये और उसके हुक्मों से बेपरवाह हो जाये कि इसका अंजाम बहुत बुरा है। तकलीफ़ उठानी पड़ेगी।

(बागे-जन्नत यानी ख़ुदाई बाग़, सफा न० 323 )

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)

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