दिन भर में सतरह (17) रकअतें फ़र्ज़ क्यों, पढ़िए

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Namazi apne samne se guzarne wale ko rokega
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दिन भर में सतरह 17 रकअतें फ़र्ज़ क्यों

दिन भर में सतरह 17 रकअतें फ़र्ज़ क्यों

जिस वक़्त आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मेअराज की रात सतरह मक़ामात की सैर की।

सातों आसमानी की आठों बहिशतें अर्श मुअल्ला और कुर्सी वगैरह उन मक़ामात को मुलाहिज़ा फ़रमाया

और यह सब मिला कर सतरह मक़ामात हुए इसलिए उम्मते महम्मदिया को भी यह शर्फ़ हासिल है कि हर नमाज़ी उन मक़ामात का रूहानी सफर होता है।

लेकिन हमारे आक़ा हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को उन मक़ामात पर जिस्मानी सफर का शर्फ़ हासिल हुआ।

(बागे-जन्नत यानी ख़ुदाई बाग़, सफा न०289)

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)

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