हाकिम का गुस्से की हालत में कोई भी फैसला या फतवा देना सही है या नहीं जानिए

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Hakim Ka Gusse Ki Halat Mein Faisla Karna Ya Fatwa Dena
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Hakim Ka Gusse Ki Halat Mein Faisla Karna Ya Fatwa Dena

हाकिम का गुस्से की हालत में फैसला करना या फतवा देना।

अबू बकर रज़ि से रिवायत है उन्होंने कहा

मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से सुना आप फरमा रहे थे

कोई दो आदमियों का फैसला उस वक्त न करे जबकि वो गुस्से में हो।

फायदे-

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अलावा दूसरे लोगों को गुस्से की हालत में फैसला करना मना है।

इसी तरह सख्त भूख प्यास और नींद आने के वक्त फैसला नहीं चाहिए क्योंकि उससे फैसले की ताकत कमजोर हो जाती है।

(औनुलबारी 5/600)

(मुख़्तसर सही बुखारी सफा न०1773 )

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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