बेशक मुसलमान के लिए नमाज़ की अहमियत बहुत ज़्यादा है, तो चलिए कुछ जानें नमाज़ के बारे में

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Musalman ke liye namaz ke ehmiyat

तौहिद के बाद नमाज़ सबसे पहला हुक्म है जो नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को मिला था।

सुर: मुद्दस्सिर की पहली आयत –

“लिहाफ़ में लेटे हुए उठ, और होशियार कर, और अपने रब की बढ़ाई बोल”

यहाँ रब की बढ़ाई बोलने से मुराद नमाज़ की बुनियाद है।

नमाज़ इस्लाम का वह फ़र्ज़ है की क़ुरआन पाक में 100 बार इसकी तारीफ़ इसे अदा करने का हुक्म और ताकीद आयी है।

नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने नमाज़ के बारे में फ़रमाया –

नमाज़ दीन का सतून है जिसने यह सतून ढा दिया उसने इस्लाम की इमारत ही गिरा दी।

नमाज़ दिल की रोशनी है ।

नमाज़ मेरी आँख की ठंडक है।

इन्सान आग में जलता रहता है और नमाज़ से वह आग बुझ जाती है।

कुफ्र और ईमान के बीच पहचान नमाज़ ही है।

यहाँ तक कह दिया कि जिसने जान बुझ कर नमाज़ छोड़ दी उसने कुफ्र किया।

हज़रत अबू ज़र रज़िo रिवायत करते हैं कि नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जाड़े के दिनों में बाहर तशरीफ़ ले गए पतझढ़ के दीन थे।

आपने दो दलिया पकड़ लीं। पत्ते गिरने लगे ।

फ़रमाया “ऐ अबू ज़र!”

मैंने कहा ” हाज़िर हु ऐ अल्लाह के रसूल! ”फ़रमाया” बन्दा (मुसलमान) अल्लाह के लिए नमाज़ पढ़ता है तो उसके गुनाह इसी तरह गिरते हैं जैसे इस पेड़ से यह पत्ते!”

(तर्कीबे नमाज़ सफ़ा न० 18 )

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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