जूतों पर मसह करने के बजाये दोनों पावों को धोना।

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Juton par masah karne ke bajaye donon pavon ko dhona
Masah
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Juton par masah karne ke bajaye donon pavon ko dhona

जूतों पर मसह करने के बजाये दोनों पावों को धोना।

अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ि. से रिवायत है कि एक बार उन पर किसी ने ऐतराज करते हुये कहा कि मैं देखता हूँ

आप हजरे अवसद (कला पत्थर) और रुकने यमानी के अलावा बैतुल्लाह के किसी कोने को हाथ नहीं लगाते

और आप सिब्ती जूते पहनते हो और पीला खिजाब इस्तेमाल करते हो,

नीज मक्का में दूसरे लोग तो जुलहिज्जा का चांद देखते ही एहराम बांध लेते हैं।

मगर आप आठवीं तारीख तक एहराम नहीं बांधते। इब्ने उमर रज़ि. ने जवाब दिया

कि बैतुल्लाह के कोनों को छुने की बात तो यह है कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को दोनों यमानी (हजरे असवद, रुक्ने यमानी) के अलावा किसी दूसरे रुक्ने को हाथ लगाते नहीं देखा

और सब्ती जूतियों के बारे में यह है कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को वो जूतियाँ पहने देखा जिन पर बाल न थे और आप उनमें वुजू फरमाते थे।

लिहाजा मैं उन जूतों को पहनना पसन्द करता हूँ, रहा जर्द रंग का मामला तो मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को यह खिजाब लगाते हुये देखा है।

इसलिए मैं भी इस रंग को पसन्द करता हूँ

और एहराम बांधने कि बात यह है कि मैंने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को उस वक्त तक एहराम बांधते नहीं देखा,

जब तक आपकी सवारी आपको लेकर न उठती, यानी आठवीं तारीख को।

फायदे:

जूतों पर मसह करने की रिवायतें जईफ हैं। इसलिए पांव धोने चाहिए।

दलील की बुनियाद यह है वुजू में असल अंगों का धोना है।

नीज अगर मसह किया हो तो य-त-वज्जओ फिहा के बजाये “य-त-वज्जओ अलैहा” होना चाहिए था।

(फतहुलबारी, सफ़ा न० 269, जिल्द 1)

(मुख्तसर सही बुखारी सफ़ा न० 118)

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