ईद-उल-अज़हा बकराईद के दिन खाने का बयान।

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Qurbani Ke janwar Ko Haar Pehnana
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Eid al-Adha ke din khane ka bayan

ईद-उल-अज़हा (बकराईद) के दिन खाने का बयान।

बराअ बिन आज़िब रज़ि. से रिवायत है,

उन्होंने कहा कि मैंने नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को खुतबे में इशारा फरमाते सुना,

आपने फरमाया कि आज के इस दिन में पहला काम जो हम करेंगे, वह यह कि नमाज़ पढ़ेंगे,

फिर वापस जाकर कुर्बानी करेंगे तो जिसने ऐसा किया, उसने हमारे तरीके को प् लिया।

फायदे:

इमाम बुखारी ने इस हदीस पर इन लफ्ज़ों के साथ उनवान कायम किया है।

“मुसलमानों के लिए ईद के दिन पहली सुन्नत का बयान” मुसनद इमाम अहमद,

तिरमजी और इब्ने माजा की रिवायत में है कि

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ईदुलअज़हा के दिन वापस आकर अपनी कुर्बानी का गोश्त खाया करते थे।

(औनुलबारी, 1/74)

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बराअ बिन आज़िब रज़ि. से ही रिवायत है उन्होंने कहा कि

नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ईदुलअज़हा में नमाज़ के बाद हमारे सामने खुत्बा इरशाद फरमाया तो कहा

जो आदमी हमारी तरह नमाज़ पढ़े और हमारी तरह मुरबानी करे तो उसका फर्ज पूरा हो गया

और जिसने नमाज़ से पहले कुर्बानी कि तो नमाज़ से पहले होने की बिना पर कर्बानी नहीं है।

इस पर बराअ रज़ि. के मामू जनाब अबू बुरदा बिन नियार रज़ि. ने कहा कि

ऐ अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम!) मैंने तो अपनी बकरी नमाज़ से पहले ही कुर्बानी कर दी,

क्योंकि मैंने समझा कि आज चूँकि खाने पीने का दिन है इसलिए मेरी खवाहिश थी कि सबसे पहले मेरे ही घर में बकरी कुर्बानी कि जाये।

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इस बिना पर मैंने अपनी बकरी कुर्बानी कर दी और नमाज़ के लिए आने से पहले कुछ नाश्ता भी कर लिया।

आपने फरमाया कि तुम्हारी बकरी तो सिर्फ गोश्त कि बकरी ठहरी (कुर्बानी नहीं हुई) उन्होंने कहा कि

ऐ अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) हमारे पास एक भेड़ का बच्चा है जो मुझे दो बकरियों से ज्यादा प्यारा है

तो क्या वह मेरी तरफ से काफी हो जायेगा? आपने फ़रमाया, हां लेकिन तुम्हारे सिवा किसी और को काफी न होगा।

फायदे:

कुर्बानी के जानवर के लिए दो दांत होना जरुरी है।

इसके बगैर कुर्बानी नहीं होती। हदीस में गुजरी इजाजत सिर्फ अबू बुरदा रज़ि के लिए थी।

इससे यह भी मालूम हुआ कि दीन इन्सान के पाक जज्जबात का नाम नहीं बल्कि उसके लिए अल्लाह की तरफ से नाजिल किया गया होना जरुरी है।

(मुख़्तसर सही बुखारी सफ़ा न० 402)

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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