अपने बदन का गोश्त का टुकड़ा भी अपनी माँ को खिला दोगे तो भी उसका हक़ अदा न होगा

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Ma-Baap ko takleef dene ki Saza
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Ma-Baap ko takleef dene ki Saza

माँ-बाप को तकलीफ़ देने की सज़ा

इरशाद फ़रमाया अल्लाहतआला ने कि:-

तुम अपने माँ बाप के साथ अच्छा बर्ताव किया करो।

अगर तुम्हारे सामने उनमे एक या दोनों बूढ़े हो जायें तो उनके सामने ‘हूँ’ भी न करना और न उनको झिड़कना

और उनसे अदब के साथ बात करना

और उनके सामने आजिज़ी से झुके रहना और उनके लिए यूँ दुआ करते रहना कि

ऐ मेरे रब उन दोनों पर रहमत फरमाइए जैसा कि उन्होंने मुझको बचपन में पाला है।

और हुज़ूर पुरनूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) फ़रमाते हैं कि

जो शख्स अपने माँ-बाप को तकलीफ़ देगा, जन्नत उस पर हराम हैं।

माँ-बाप को खुश रखना, अल्लाहतआला को खुश रखना हैं

और उनको नाराज़ करना अल्लाहतआला को नाराज़ करना हैं।

हुज़ूर अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ख़िदमत में एक शख्स ने अर्ज़ की

-या रसूल अल्लाह! मुझे कोई ऐसी नसीहत कीजिए जो दुनिया व आख़िरत में काम आये।

आपने फ़रमाया- तुम्हारे माँ-बाप ज़िन्दा हैं? कहा हाँ।

हुज़ूर ने फ़रमाया- तुम उनकी ख़िदमत किया करो।

उनको एक लुक़मा खिलाने के बदले तुमको जन्नत मै एक महल मिलेगा।

अपने बदन का गोश्त का टुकड़ा भी अपनी माँ को खिला दोगे तो भी उसका हक़ अदा न होगा;-

एक और शख्स ने अर्ज़ की-या रसूल अल्लाह।

में अपनी माँ की ख़िदमत भी करता हूँ। रोटी-कपड़ा भी देता हूँ।

मगर वो मुझसे लड़ती रेहती है। अब जो आपका हुक्म हो वह करूँ।

हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया- तुम अपनी माँ की ख़िदमत करो।

क़सम है अल्लाहतआला की अगर तुम अपने बदन का गोश्त का टुकड़ा भी अपनी माँ को खिला दोगे तो चौथाई हक़ भी उसका अदा न होगा।

क्या तुमको मालूम नहीं की जन्नत माँ और बाप के क़दमों के नीचे है ।

माँ-बाप का यह मर्तबा सुनकर उस शख्स ने रोकर कहा,

या रसूल अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) !

आप सच फ़रमाते हैं क़सम है मुझको उस खुदा की जिसने आपको सच्चा रसूल बनाया है!

अब मै अपनी माँ की खूब ताबेदारी करूँगा। बस वह अपनी माँ के पास आया

और उसके पॉव चुम कर कहा अम्मा जान! मुझको अल्लाह के रसूल ने यही हुक्म दिया है

की अपनी माँ की ख़िदमत करो और उसको राज़ी रखो।

माँ ने खुश होकर बेटे को गले से लगा लिया और अल्लाह व रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की तारीफ़ की।

(बाग़े-जन्नत यानी ख़ुदाई बाग़, सफ़ा न० 78)

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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