हज के बाद कुरबानी के बगैर उमरह करना।

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Hajj ke baad qurbani ke bagair umrah karna
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Hajj ke baad qurbani ke bagair umrah karna

हज के बाद कुरबानी के बगैर उमरह करना।

आइशा रज़ि. से जो हदीस (869,791) हज के बाबत है वह कई बार मुकम्मिल नकल होकर गुजर चुकी है।

फायदे:

बाज लोगों का ख्याल है कि माहे जिलहिज्जा में हज के बाद भी अगर कोई उमरह का अहराम बांधना चाहे तो उसे कुरबानी देनी होगी।

इमाम साहब उसकी तरदीद फरमाते हैं कि हज़रत आइशा रज़ि. ने हज के बाद जो उमरह किया था,

उसमें कोई कुरबानी, फ़िदया रोजे अदा नहीं किये।

(मुख़्तसर सही बुखारी सफ़ा न० 668)

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