जानिए जमाअत के साथ नमाज़ पड़ने का कितना सवाब है?

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Sawab of offer namaz with jamat
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Sawab of offer namaz with jamat

Rasool-e-Khuda (Sallallahu Allaihi Wasallam) said,

The person who read from Isha’s prayer prayer.

Then read from the Fajr prayers in the morning

Then all his night will be written in the prayer.

You used to be very upset with the man who did not read from the prayers.

One day you (a man) saw a man who read the prayer alone. You said to him, Are not you a Muslim who has not prayed Namaz?

And you have said that the person who will study from the prayer period of five years,

will pass like a power from the bridge, and he will be among those who will be the first to enter the Paradise

and his face will be illuminated by the moon like the moon of the fourteenth night and he will Every day there is a rave equivalent to one thousand martyrs.


जमाअत से नमाज़ पढ़ने का सवाब

रसूल-ए-खुदा(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया कि-

जो शख़्स इशा की नमाज़ जमाअत से पढ़े और फिर सुबह की नमाज़ जमाअत से पढ़े तो उसकी सारी रात इबादत ही में लिखी जावेगी। आप उस आदमी से बहुत नाराज़ होते थे जो नमाज़ जमाअत से न पढ़ता । एक दफ़ा आप(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने एक आदमी को देखा कि उसने अकेले नमाज़ पढ़ी। आपने उससे फ़रमाया क्या तुम मुसलमान नहीं थे जो जमाअत से नमाज़ नहीं पढ़ी? और आपने फ़रमाया कि जो आदमी पाँचों वक़्त की नमाज़ जमाअत से पढ़ेगा, वह पुलसिरात से बिजली की तरह गुज़र जायेगा और वह उन लोगों में होगा जो जन्नत में सबसे पहले दाखिल होंगे और उसका चेहरा चौदहवीं रात के चाँद की तरह नूर से रोशन होगा और उसको हर रोज़ एक हज़ार शहीदों के बराबर सवाब मिलता है।

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जन्नत में मकां अपना बनाते हैं नमाज़ी,
मस्जिद में बड़े शौक़ से जाते हैं नमाज़ी।

क्या शौक़ जमाअत है इबादत से है मुहब्बत,
मस्जिद में अजा सुनते ही जाते है नमाज़ी।

डरते है क़ज़ा होने से मिटते हैं अदा पर,
जान अपनी नमाज़ों में लड़ाते हैं नमाज़ी।

सजदे का निशा चाँद-सा रोशन हैं जबी पर,
हूराने बहिश्ती को लुभाते हैं नमाज़ी।

कहता हैं यह दरवाज़े पर दारोग़-ए-जन्नत,
हट जाओ कि फिरदौस में जाते हैं नमाज़ी।

 

(बाग़े जन्नत यानी ख़ुदाई बाग़,सफ़ा न० 241)

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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