जन्नत और दोज़ख़ में जाने का सबब जानिए क्या है

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Burayi ko Bura Jaano Insan Ko Nahi
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Cause to go in heaven and hell

Cause to go in heaven and hell

जन्नत और दोज़ख़ में जाने का सबब जानिए

इरशाद फ़रमाया रसूल अल्लाह(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने कि-

जो अल्लाहतआला से मिला यानी मरते दम तक उसका किसी चीज़ को शरीक न जाना वह जन्नत में जावेगा और जो मरते वक़्त तक किसी चीज़ को अल्लाहतआला का शरीक जानता रहा, वह दोज़ख़ में जायेगा।

(मुस्लिम)

फ़ायदा

मतलब यह है कि जो शख़्स मर्द हो या औरत,

अल्लाहतआला को मालिक और हाजित रवा समझता रहा और किसी हाल में भी किसी मख़लूक को उसका शरीक न बनाया,

यानी अल्लाह की-सी सिफ़त या क़ुदरत या अख़्तियार किसी में न समझा,

बस वह जन्नती होगा और जो अल्लाहतआला के सिवा किसी और की भी नफ़ा

और नुक़सान का मालिक मानता रहा वह मुशरिक है, दोज़ख़ी है।

रहमत-ए-आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से सवाल किया गया कि

या रसूल अल्लाह! जन्नत और दोज़ख़ में जाने का क्या सबब है? तब अपने यह हदीस फ़रमायी।

(बाग़े-जन्नत यानी ख़ुदाई बाग़, सफ़ा न० 325)

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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Cause to go in heaven and hell

Prophet (Sallallahu alaihi wasallam) Said

Anyone who meets Allah, ie, does not Shirk anything with Allah, he will enter the Paradise

and whoever do Shirk with Allah as a person till death, he will go to hell.

(Muslim)

Benefits –

This means that if a person is a man or a woman,

considered Allah to be the owner and the hazit Rawa and in no case did he make any rider his share,

that is, none of God has been considered as a person or a person.

He will be a Jannati and whoever believes in Allahabad,

other than any other person, is the owner of profit and loss, it is a pity, it is a hellfire.

Rahmat-E-Alam (Sallallahu Alaihi wasallam) was questioned Ya Prophet (Sallallahu Alaihi wasallam)!

whether or not What is the reason for going to heaven and hell? Then this Hadeeth fades away.

(Baghe-Jannat i.e. Khudai Bagh, Page no 325)

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