ख़ैरात माल ख़र्च करने का ही नाम नहीं है इस तरह से भी ख़ैरात की जा सकती है

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Khairat mall kharch karne ka hi naam nahi hai

ख़ैरात माल ख़र्च करने का ही नाम नहीं है

इरशाद फ़रमाया रसूल अल्लाह(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने कि-

हर रोज़ जब कि सूरज निकले तो आदमियों की हर एक हडडी और जोड़ पर ख़ैरात है।

जैसे इन्साफ़ करना, किसी की मदद करना, सवासी पर चढ़ा देना या किसी का असबाब सवारी रखवा देना वग़ैरा भी ख़ैरात है,

और अच्छी बात से किसी का दिल ख़ुश करना, कलमा सिखा देना भी सदक़ा

और ख़ैरात है और जो क़दम नमाज़ के वास्ते चले वह भी ख़ैरात है

और तकलीफ़ देने वाली चीज़ जैसे काँटा, हडडी, पत्थर रास्ते से दूर कर देना भी ख़ैरात है।

(बुख़ारी शरीफ़)

फ़ायदा-

यानी हर रोज़ आदमी को अपने तमाम बदन के जोड़ो के बदले सदक़ा यानी ख़ैरात देना चाहिए। इसलिए कि हर रोज़ की ज़िन्दगी अता करना और तन्दरूस्त रखना यह अल्लाहतआला का बहुत बड़ा एहसान है। इसलिए बन्दों को चाहिए कि उसका शुक्र अदा करें। शुक्र करना और ख़ैरात देना माल ही ख़र्च करने का नाम नहीं है बल्कि लोगों को नफ़ा पहुँचाना वग़ैरा सब ख़ैरात में दाखिल है।

(बाग़े-जन्नत यानी ख़ुदाई बाग़, सफ़ा न० 180)

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