सात चीज़ें ऐसी हैं कि उनका सवाब मरने के बाद भी मिलता रहता हैं वो जानिए कौन-कौनसी हैं

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Achche kamon mein maal kharch karne ka sawab
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Achche kamon mein maal kharch karne ka sawab

अच्छे कामों में माल ख़र्च करने का सवाब

इरशाद फ़रमाया अल्लाहतआला ने कि-

जो लोग रात और दिन छुपे और ज़ाहिर जब भी मौक़ा मिले अपने माल को अल्लाहतआला की राह में ख़र्च करते है

उनके ख़र्च करने का सवाब उनके रब के यहाँ उसको मिलेगा और क़यामत के दिन न उनको कोई ख़ौफ होगा और न वह कोई ग़म देखेंगे।

(सूरत आलेइमरान)

हुज़ूर(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) हैं कि-

अपनी बुज़ुर्गी में एक दरहम खैरात करना इससे अच्छा हैं कि मरने के बाद सौ दरहम ख़ैरात किये जायें।

(अबुदाऊद)

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फ़ायदा-

इस हदीस शरीफ़ का मतलब यह हैं कि अगर कोई मर्द या औरत अपनी ज़िन्दगी में एक रुपया अल्लाह कि राह में ज़रूरत की जगह की ख़र्च करे तो यह ज़्यादा अच्छा और मुफ़ीद हैं इससे कि मरने के बाद सौ रूपये ख़र्च किये जायें।
रहमते दो आलम(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) फ़रमाते हैं कि-

जो मुसलमान किसी ग़रीब मुसलमान को कपड़े पहनाये तो अल्लाहतआला उसको जन्नत के सब्ज़ रेशम के कपड़े पहनायेगा। और जो मुसलमान किसी भूखे मुसलमान को खाना खिलाये तो अल्लाहतआला उसको जन्नत के मेवे खिलायेगा, और जो मुसलमान किसी प्यासे मुसलमान को पानी पिलायेगा तो अल्लाहतआला उसको जन्नत की शराबे पाक पिलायेगा।

(तिरमिज़ी)

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इरशाद फ़रमाया रसूलल्लाह(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने कि-

सात चीज़ें ऐसी हैं कि उनका सवाब मरने के बाद भी मिलता रहता हैं।

वह यह हैं-

  1. दीन का इल्म सिखाना या सिखाने वालों की रूपये वग़ैरा से मदद और खिदमत करना कि वह बेफिक्री से पढ़ाते-सिखाते रहें।
  2. ज़रूरत की जगह कुँआ बनाना।
  3. ज़रूरत की जगह मस्जिद बनाना।
  4. दरख़्त लगवाना कि लोग आराम करें।
  5. किसी ग़रीब मुसलमान के लिए रहने का मकान बनवा देना या मुसाफ़िर-खाना बनवा देना की मुसाफिरों को आराम मिले।
  6. क़ुरआन मजीद या हदीस व तफ़सीर व फ़िक़ा-ए-दीन के मसलों की किताबें छोड़ जाना या किसी ज़रूरत-मन्द को ख़रीद कर ले देना या छुपवा देना।
  7. नेक औलाद छोड़ जाना या दिनी मदरसा या पुल वग़ैरा बनवा देना या ऐसे कामों में चन्द देना सब सदक़ा जारिया कहलता हैं।

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फ़ायदा-

मुसलमान भाइयो और बहिनो! ग़रीब लोगों की जान से, माल से मदद और खिदमत करना, उनकी हाजित पूरी करना, आलिमों और तालिबइल्मो की ख़िदमत और मदद करना बहुत ही आलीशान अम्ल हैं। भूखों का पेट भरना, प्यासों को पानी पिलाना, नंगो को कपड़े पहनाना, भूले हुए को रास्ता बतलाना, यह सब बेहतरीन अमल और अच्छी कमाई हैं। मरने के बाद यह कमाई काम आयेगी।

हदीस शरीफ़ में हैं कि अर्शे आज़म के नीचे यह तीन बातें लिखी हुई हैं कि-

  1. अल्लाह एक हैं,
  2. मख़लूक़ गुनहगार हैं,
  3. नफ़ा उस आदमी को हैं जो अल्लाह का दिया हुआ माल मरने से पहले उसकी राह में खर्च कर दे, और उसको आख़िरत में निजात का ज़रिया बनाये

और नुक़सान उस आदमी को हैं जिसमे खाया न पिया और न अल्लाह की राह में दिया और सब छोड़-छोड़ कर मर गया।

मालूम होना चाहिए कि अपना माल, रुपया, पैसा, कपड़े वग़ैरा ऐसे लोगों को देना अफ़ज़ल हैं कि जो बुज़ुर्ग हों और दीनदार हों,

जो नमाज़-रोज़े के पाबन्द हों और शर्म व हया से माँगते न हों।

बाक़ी ज़रूरत के मौक़े पर हर हाजित-मन्द ग़रीब की और मोहताज की ख़िदमत करना बहुत बड़ा सवाब हैं चाहे वह मोहताज ग़रीब ग़ैर मुस्लिम हों।

(बाग़े-जन्नत यानी ख़ुदाई बाग़, सफ़ा न० 219)

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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