आप ﷺ का आख़िरी हज का वाकिया, जिसके बाद आप को दुनिया से वापस जाने का एहसास हुआ

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Aap Sallallahu Alaihi wasallam ka aakhri Hajj
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Aap Sallallahu Alaihi wasallam ka aakhri Hajj

आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का आख़िरी हज का वाकिया

हिजरत का दसवां साल था। उस साल प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हज का इरादा किया

तो एक लाख चौबीस हज़ार मुसलमान आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ जाने के लिए तैयार हो गये।

हर तरफ़ मुसलमान ही मुसलमान नज़र आ रहे थे।

इस्लाम की यह कामियाबी देखकर हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को एहसास होने लगा कि

अब आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का काम पूरा हो चुका

और इस दुनिया से वापस जाने का वक़्त क़रीब आ गया।

इतना बड़ा क़ाफ़िला मंज़िल पर मंज़िल तय करता हुआ मक्का पहुंच गया।

सब ने प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ हज किया।

इसी मौक़े पर हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपना मशहूर ख़ुत्बा दिया।

आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ऊंटनी पर सवार थे।

सब लोग आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास अरफात के मैदान में जमा थे।

आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया-

“हे लोगो ! मेरी बात को अच्छी तरह समझ लो।

हो सकता है कि मैं इस मौक़े पर कभी तुम्हारे साथ न हूं।

लोगो ! अरबी को ग़ैर-अरबी पर, ग़ैर-अरबी को अरबी पर,

गोरे को काले पर और काले को गोरे पर कोई बड़ाई नहीं।

बड़ाई तो उसे हासिल है जो ख़ुदा से ज़्यादा डरने वाला है।

मुसलमान आपस में भाई-भाई हैं।

जो खुद खाओ वही अपने ग़ुलाम को खिलाओ,जो ख़ुदा पहनो, वही उनको पहनाओ।

मैं तुम में एक चीज़ छोड़े जाता हूं, अगर तुमने इसे मज़बूत पकड़ लिया तो राह से न भटकोगे-वह चीज़ अल्लाह की किताब है।”

इसके बाद आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने सब से मालूम किया-

“क्या मैंने पैग़ाम पहुंचा दिया।”

हज़ारों जुबानों ने जवाब दिया-

“बेशक आपने पहुंचा दिया।”

फिर आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आसमान की तरफ़ उंगली उठाई और फ़रमाया-“हे अल्लाह तू गवाह रहना।”

(हमारे हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम: सफ़ा न० 74)

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