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Ek wali ki hikayat
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Ek wali ki hikayat

एक वली की हिकायत

हज़रत अबुज़करिया (रह०) की जब वफ़ात होने लगी तो उसके मुरीदों ने उनको कलिमा पढ़ने को कहा। उन्होंने मुँह फेर लिया।

तीसरी बार कहने के जवाब में उन्होंने कहा, मैं नहीं कहता। मुरीदान हैरान हो गये। थोड़ी देर में उनको होश आया और मुरीदों से फ़रमाया कि-

तुम मुझसे कुछ कहते थे? मुरीदों ने कहा कि हम आपको कालिमा पढ़ने को कहते थे।

आख़िर में आपने जवाब दिया कि मैं नहीं कहता। फिर हज़रत साहब ने मुरीदों से फ़रमाया।

ऐ अज़ीज़ो! उस वक़्त मुझको बड़ी तेज़ प्यास लगी हुई थी और शैतान पानी का प्याला भरकर मेरे सामने लाया और कहता था

कि यह कह दे कि तेरे सिवा कोई खुदा नहीं है। जब तुझको पानी दूँगा।

मैंने दोबारा उसकी तरफ़ से मुँह फेरा। तीसरी बार मैंने उसको जवाब दिया कि मैं नहीं कहता।

बस वह बईमान बे उम्मीद होकर भाग गया। अल्लाहतआला ने उस वक़्त के इम्तेहान में मेरी मदद फ़रमायी और दुश्मन से मुझको बचा लिया।

अब तुम सब गवाह रहो। मैं कलिमा-ए-शहादत पढ़ता हूँ-

कलिमा पढ़ते ही अल्लाह को प्यारे हो गये।

फ़ायदा-

सुबहान अल्लाह! क्या मुबारक मौत है अल्लाहतआला के प्यारे बन्दों की। ऐ इन्सान! तू भी खुदा से डर और अल्लाह वालों से सबक हासिल कर।

(बाग़े-जन्नत यानी ख़ुदाई बाग़, सफ़ा न० 297)

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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