जीतनी अय्याशी कर लो मगर मौत ज़रूर आएगी, पढ़ें और शेयर करें

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Jitni ayyashi kar lo magar maut zaroor aayegi
rich and poor grave
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Jitni ayyashi kar lo magar maut zaroor aayegi

जीतनी अय्याशी कर लो मगर मौत ज़रूर आएगी,

सुलमान बिन अब्दुल मालिक बड़ा खूबसूरत था। वह एक वक़्त में चार निकाह करता था। चार दिन के बाद चारों को तलाक़ देकर चार और करता था।

फिर उनको तलाक़ देकर चार और करता था। बांदिया अलग थीं लेकिन पैंतीस साल की उम्र में मर गया। चालीस साल भी पुरे नहीं किए।

दुनिया में कितनी अय्याशी की इसके मुक़ाबले में उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ है इक्तालिस साल उनके भी पुरे नहीं हुए लेकिन उसने अल्लाह को राज़ी करना शुरू कर दिया।

अब देखिए कि जब सुलेमान को कब्र में रखने लगे तो उसका जिस्म हिलने लगा तो उसके बेटे अय्यूब ने कहा मेरा बाप ज़िन्दा है।

हज़रत उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ (रह०) ने कहा बेटा तेरा बाप ज़िन्दा नहीं है, अज़ाब जल्दी शुरू हो गया है।

जल्दी दफ़न करो हाँलाकि ज़ाहिरी तौर सुलेमान बिन अब्दुलमालिक बनू उमैय्या के खूबसूरत शहज़ादों में से था। अब्दुल अज़ीज़ (रह०) फरमाते हैं

कि मैंने उसको कब्र में उतारा और चेहरे से कपड़े को हटाकर देखा तो चेहरा क़िबले से हटाकर दूसरी तरफ़ पड़ा था और रंग स्याह हो गया था।

कब्र के कोड़ों न जो छोड़ा तो कब्र की गर्मी ने हडिड्यों को भी गला दिया, उसकी राख बना दी।

वह खूबसूरत चेहरा वह हसीन आँखें,

एक हदीस में आता है मेरे बन्दे दुनिया को हवस की नज़र से मत देख सबसे पहले कब्र में कीड़ा जिस चीज़ को खाता है

वह तेरी आँख है। आँख झुका ले, नज़र को अपनी आँख को बेहया न बना। ये आँखें इसलिए नहीं है

कि तू औरों की बेटियों और बीवियों को देखे और नादानों के बनाए हुए महल देखकर कुछ साँस, कुछ घंटे कुछ हफ़्तों के लिए करोड़ों के घर बनाकर बैठा हुआ है,

करोड़ों के बंगले बनाकर बैठा हुआ है।

इनसे बड़ा नादान भी कोई है जो गिरती हुई जो शाख पर आशियाना बनाए, जो टूटी हुई दीवारों पर घर की बुनियाद रखे।

जो गिरती हुई दिवार से टेक लगाने की कोशिश करे जो ऐसे जहाँ से दिल लगाने की कोशिश करे जो मछर का पर और धोके का घर और मिटटी वाला घर है,

मकड़ी का जाला है और जिसके पल का भी भरोसा न हो।

इसी दुनिया ने हर एक से बगावत की, यह गददार दुनिया,

यह बे वफ़ा दुनिया न मेरे बाप के पास रही न मेरे पास रहेगी। आज हम उस टूट जाने वाले घर पर सब कुछ लगाकर बैठे हुए हैं।

जब जनाज़ा कब्र में डालेगा, कीड़े खाएंगे, कब्र की तपिश उसके गोश्त को गलाएगी,

उसकी हडिड्यों को चूरा करेगी फिर एक दिन आएगा ज़मीन अंगड़ाई लेगी नीचे का ऊपर और ऊपर का नीचे और ऊपर से ज़ालिम हवा आएगी।

इस सहजादे की हडिड्यों की राख को उड़ाकर गुम कर देगी जैसे यह पहले कुछ न था। आज फिर कुछ न रहा।

यह मेरा तेरा यह कर लिया, यह कर रहा हूँ मेरे भाइयो यह सारी ज़िन्दगी की मेहनत जब मौत से ज़रब खाएगी तो नतीजा सिफर हो जाएगा तो उसकी तैयारी करो जिधर हर लम्हे हमारा सफ़र हो जारी है। जो मरता है

उसकी कयामत तो आ जाती है। कयामत तो सारी काएनात की भी है।

अल्लाह तआला एतदाल से चलने की दावत देता है। हमारा मज़हब रहबानीयत नहीं सिखाता कि दुनिया को छोड़कर बैठे जाओ।

(मौलाना तारिक़ जमील साहब के इबरत अंगेज़ बयानात, सफ़ा न० 349)

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