रसूल-ए-करीम ﷺ की वफ़ात का मर्ज़

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Rasool-e-Kareem ﷺ ki wafat ka Marz
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Rasool-e-Kareem ﷺ ki wafat ka Marz

Rasool-e-Kareem ﷺ ki wafat ka Marz

अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहु

रिवायतों में आता है के: क़ल्ब-ए-वफ़ात के कुछ साल पहले आप (सल्लाहु अलैहि वसल्लम) को एक यहूदान ने दावत दी।

आप अपने 2 दो सहाबा के साथ उस दावत में तशरीफ़ ले गए।

उस यहूदान ने खाने में ज़हर मिला कर आपके सामने पेश किया।

जिसे खाकर वो 2 दो सहाबी फ़ौरन इंतेक़ाल कर गए।

और आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने वो लुक्मा मुँह में लेकर चबा ही लिया और ज़हर का अंदेशा होने पर थूंक दिया।

रिवायत में आता है के आप को आखिरी वक़्त तक होने वाला मर्ज़ की तकलीफ का सबब यही ज़हर था।

आपके मर्ज़ में कमी बेशी होती रहती थी खास वफ़ात के दिन (12 रब्बी-उल-अव्वल) के रोज़ आपका हुजरा (माई आयशा का घर) मस्जिद के सामने ही था।

अपने पर्दा उठकर देखा तो लोग नमाज़-ए-फज्र पढ़ रहे थे।

ये देखकर खुसी से आप हंस पड़े।

लोगों ने समझा के आप मस्जिद में आना चाहते हैं।

मारे ख़ुशी के तमाम सहाबा बे काबू हो गए।

मगर अपने इशारे से रोका और हुजरे में दाखिल हो कर पर्दा दाल दिया।

ये सबसे आखरी मौका था की सहाबा किराम ने जमाल-ए-नबूवत की जियारत की।

इसके बाद बार-बार गश्ती (बेहोशी) का दौर पड़ने लगा।

हज़रात फातिमा ज़ेहरा (रज़ी अल्लाहु अन्हा) की ज़ुबान से शिद्दते ग़म में ये लफ्ज़ निकल गए “हाय रे मेरे बाप की बेचैनी”

आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया – “ए बेटी! तुम्हारा बाप आज के बाद कभी बेचैन न होगा”।

(बुखारी जिल्द:2, सफ़ा:241, बाब: मारजुनब्बी सल्लाल्ल्हू अलैहि वसल्लम)

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