आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ज़ुबान-ए-मुबारक के आखरी अल्फ़ाज़

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Aap SAW ki Zuban-E-Mubarak Ke akhri Alfaz
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Aap SAW ki Zuban-E-Mubarak Ke akhri Alfaz

वफ़ात से थोड़ी देर पहले सह पहर का वक़्त था की आपके सीना-ए-अक़दस में साँस की घर-घराहट महसूस होने लगी।

इतने में आपके लबे-मुबारक हिले और लोगों ने ये अल्फ़ाज़ सुने:-

“नमाज़ और ग़ुलामों का ख़याल रखो”

आपके पास में पानी की लगन थी इसमें बार हाथ डालते,

और चेहरे अक़दस पर मलते और कलमा पढ़ते

अपनी चादर मुबारक को कभी मुँह पर डालते तो कभी हटा देते

हज़रात आइशा (रज़िअल्लाहु अन्हु) आपके सर-ए-मुबारक को अपने सीने से लगाए बैठी हुई थीं,

इतने में आपने हाथ उठा कर ऊँगली से इशारा किया और 3 मर्तबा फ़रमाया:-

“(तर्जुमा: अब कोई नहीं! बल्कि वो बड़ा रफीक चाहिए)…”

यही अल्फ़ाज़ ज़बाने मुक़द्दस पे थे नगाहा मुक़द्दस हाथ लटक गए और आंखे छत की तरफ देखते हुए खुली की खुली रही और आप इस दुनिया से रुखसत कर गए।

(बुखारी: जिल्द 2, सफ़ा:640, 641)

(इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन)

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