ऐसी दिलों पर आ गई है सख्ती के साथी को दफ़न होता हुआ देखकर भी मौत याद नहीं आती

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Akhir dilon ki sakhti kab dur hogi
janaza
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Akhir dilon ki sakhti kab dur hogi

दिलों की सख़्ता कब दूर होगी

कोई नहीं जाना चाहता, एक दम इधर से मौत शिकार करती है,

इधर से उठाकर ले जाती है उधर से उठाकर ले जाती है

अब तो हमारा जी लग चूका है। अब हम जाना नहीं चाहते। पहले हम आना नहीं चाहते थे। चाहते क्या?

पहले हम थे ही नहीं। हम आए, अब हम जाना नहीं चाहते और फिर दाएं बाएं चारों तरफ़ से है,

चारों तरफ़ से रोने वालियों की आवाज़ें, वे दिल को हिलाती हैं।

कभी रुलाया करतीं थीं अब तो घर में मौत हो तो किसी का दिल नहीं हिलता, ऐसे पत्थर हो गए।

कब्रिस्तान में टेलीफोन पर सौदे कर रहे होते हैं क़ब्रिस्तान में। कब्रिस्तान के अन्दर टेलीफोन पर सौदे कर रहे होते हैं।

ऐसी दिलों पर आ गई सख्ती और साथी को दफ़न होता हुआ देखकर भी मौत याद नहीं।

(मौलाना तारिक़ जमील साहब के इबरत अंगेज़ बयानात, सफ़ा न० 347)

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