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gumrahi ke mahol mein iman ki hifazat karane wale ka waqia
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gumrahi ke mahol mein iman ki hifazat karane wale ka waqia

गुमराही के माहौल में ईमान की हिफ़ाज़त करने वाले का वाक़िअ 

सन 1994, ई० में इंगलैंड में इज्तिमा था।

तो मैं रात को फ़ारिग होकर बाहर निकला तो एक नौजवान लड़का पहरा दे रहा था ब्रेडफोर्ड का।

थोड़ा सा तआरुफ़ हुआ तो वह बड़ा खुश होकर कहने लगा मुझे तो आपसे मिलने का बड़ा शौक था।

मैंने कहा तुम उधर कैसे? कहने लगा मैंने तीन दिल लगाए थे।

अल्लाह ने मेरी सारी ज़िन्दगी बदल दी। तो उसने बात कि बड़ी खूबसूरत जो मुझे आज तक याद है।

कहा जी आज इनके पास हमें गुमराह करने के लिए और नहीं है। जो कुछ उनके पास है गुमराही के लिए और नहीं है।

जो कुछ उनके पास है गुमराही के जितने असबाब हैं।

फहहाशी नंगापन के मर्द व औरत के, मर्द व औरत के मिलाप के यह हद है।

इसके आगे कुछ नहीं। हम इसमें से तौबा करके बाहर आ रहे हैं।

अब कोई और शक्ल नहीं है उनके से तौबा करके पास हमें गुमराह करने के लिए और हम अल्लाह के फ़ज़ल से उसे ठोकर मरकर आ रहे हैं

और इस बसीरत के साथ आ रहे हैं कि वह बातिल है और यह हक़ है। वहां कुछ नहीं यहां सब कुछ है।

 

(मौलाना तारिक़ जमील साहब के इबरत अंगेज़ बयानात, सफ़ा न० 219)

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