मुबारक एक गुलाम और उनके आक़ा का किस्सा, पढ़ें और शेयर करें

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khatte aur mithe ki pehachan
madina
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khatte aur mithe ki pehachan

खटटे और मीठे की पहचान

तो भाई पहले दयानत का दौर था कि मुबारक एक गुलाम है। उनके आक़ा बाग़ मैं आते हैं

अनार का बाग़ था एक अनार तो लाओ। लाए तो खटटा।

कहा अजीब आदमी हो दस साल हो गए तुम्हें बाग़ मैं काम करते हुए इतना नहीं पता खटटा कौन सा और और मिटा कौन सा।

मुझे इजाज़त कौन सी दी है चखने की। दस साल से काम कर रहा हूँ और मुझ पर हराम है एक दाना भी चखा हो।

मुझे क्या पता है खटटा कौन सा है और मीठा कौन सा है?

तो उसकी आंखें फट गयीं। यह दयानत थी नीचे से लेकर ऊपर तक।

(मौलाना तारिक़ जमील साहब के इबरत अंगेज़ बयानात, सफ़ा न० 208)

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