हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का ज़ैद रज़ी० को अपना वारिस बनाने का एक वाक़या

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Huzur Sallallahu Alaihi Wasallam ka Zaid Razi Allahu Anhu ko apna waris banane ka ek Waqya
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Huzur Sallallahu Alaihi Wasallam ka Zaid Razi Allahu Anhu ko apna waris banane ka ek Waqya

हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का ज़ैद रज़ी० को अपना वारिस बनाने का एक वाक़या

दोनों ख़ुश-ख़ुश वापस गये

ज़ैद(रज़ि०) बुलाये गये।

उनके बाप ख़ुश थे कि अब पाला मार लिया।

वह भला मां-बाप को छोड़कर यहां रहना क्यों पसन्द करने लगे।

बहरहाल ज़ैद(रज़ि०) आये तो हुज़ूर(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) उनसे बोले-

“इनको पहचानते हो, ये कौन हैं?”

“जी हां- एक मेरे बाप हैं, दूसरे चचा-” ज़ैद(रज़ि०) के चेहरे पर ख़ुशी छायी हुई थी।

“जानते हो, ये तुम्हे लेने के लिए आये हैं?” हुज़ूर(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया।

“मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जा सकता।” ज़ैद(रज़ि०) के चेहरे से ख़ुशी जाती रही।

हारिसा और उनके भाई यह जवाब सुनकर हक्का-बक्का रह गए। आख़िरकार हारिसा ज़ैद(रज़ि०) से बोले-

“बेटे! तुम मां-बाप को छोड़कर यहां रहना पसन्द कर रहे हो, जबकि मां तुम्हारे लिए बेताब हैं।”

“जी हां। मैंने मुहम्मद(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जैसा रहमदिल,

स्नेह और प्रेम करने वाला इन्सान नहीं देखा।

इनके पास रहकर मुझे आप लोगों की कमी महसूस नहीं होती।” ज़ैद(रज़ि०) ने फ़ौरन जवाब दिया।

“आज़ादी के बदले ग़ुलामी क़ुबूल कर रहे हो।” चचा ने ज़रा तेज़ आवाज़ में कहा।

मैं गुलाम नहीं, आज़ाद हु।” ज़ैद(रज़ि०) फ़ौरन बोल उठे,

“मुहम्मद(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मुझे अपनी औलाद की तरह रखते हैं।

जो ख़ुद खाते, वह मुझे खिलाते हैं। जो ख़ुद पहनते हैं, वह मुझे पहनाते हैं।

कामों में मेरी मदद करते हैं। आप मेरे साथ इससे ज्यादा क्या करते।”

ज़ैद(रज़ि०) का जवाब सुनकर उनके बाप और चचा दोनों ख़ामोश हो गये,

लेकिन प्यारे नबी(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का चेहरा ख़ुशी से दमक उठा।

आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने ज़ैद(रज़ि०) का हाथ पकड़ा और काबा की तरफ़ रवाना हो गए।

ज़ैद (रज़ि०) के बाप और चचा भी साथ हो लिये।

आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जब काबा में पहुंचे तो वहां बहुत से लोग मौजूद थे।

ज़ैद(रज़ि०) का हाथ ऊपर उठाते हुए आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने लोगों से कहा-

“आज से यह ज़ैद मेरा बेटा हैं, और मेरा वारिस हैं।” यह एलान सुनकर ज़ैद(रज़ि०) के बाप ख़ुश को गये और बोले-

“अब मुझे इत्मीनान है कि मेरा बेटा मुझसे कहीं ज़्यादा अच्छे शख़्स की सरपरस्ती में है।”

यह कहकर दोनों भाई ख़ुश-ख़ुश वापस चले गये।

[हमारे हुज़ूर(सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम), सफ़ा न० 32]

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