जानिए अल्लाह की नाफ़रमानी से बचने का इनाम क्या है

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Janiye Allah ki nafarmani se bachne ka inaam kya hai
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Janiye Allah ki nafarmani se bachne ka inaam kya hai

जानिए अल्लाह की नाफ़रमानी से बचने का इनाम क्या है

अल्लाह की नाफ़रमानी से बचने का ईनाम

आसिम बिन उमरा अन्सारी को साद बिन अबी वक़्क़ास रज़ियल्लाहु अन्हु ने भेजा

मसान की तरफ़ और यह भी कहा रास्ते में लश्कर के लिए ग़ल्ला भी लेकर आओ,

खाने का सामान भी लेकर आओ।

ईरानियों को पता चला तो उन्होने अपने गाय के रेवड़, बकरियाँ सब जंगल में छिपा दी।

जब मसान पहुँचे तो कुछ भी नहीं तो ईरानियों से कहने लगे कि भाई यहाँ हमे कुछ जानवर मिल जाएंगे?

उन्होंने कहा यहाँ कुछ नहीं मिलता तो जंगल से आवाज़ आई जानवरों की आओ हमें पकड़ लो,

हम जंगल में खड़े हुए है तो ईरानी भी हैरान हुए जब गए, तो सब जानवर खड़े हुए थे।

जब हज्जाज बिन युसूफ को यह वाक़िआ बयान किया गया तो

उसने कहा कि मैं नहीं मानता कि ऐसा हो सकता है।

उसने कहा एक आदमी उस लश्कर का अभी ज़िन्दा है

उसको बुलाकर पूछो तो उस आदमी को बुलावाया गया।

बड़ी दूर रहते थे। उनको बुलवाया। उसने कहा सुनाए क़िस्सा कैसे हुआ?

उन्होंने सार क़िस्सा सुनाया तो इस पर हिज्जाज कहने लगा यह उस वक़्त मुमकिन है

जब पूरे लश्कर में कोई अल्लाह का नाफ़रमान न हो तो सब कुछ हो सकता है।

तो वह हज्जाज से कहने लगे उसके अन्दर का हाल तो मैं नहीं जनता

लेकिन उनके ज़ाहिर हाल मैं तुम्हे बताता हूँ

कि उनसे ज़्यादा रातों को उठकर रोने वाला कोई नहीं था

और उनसे ज़्यादा दुनिया से बेज़ार कोई न था।

उस लश्कर में तीन आदमियों पर शक किया गया कि उनकी नियत ठीक नहीं है।

ये वे लोग थे जो पहले मुसलमान थे फिर मुरिद हो गये फिर दोबारा मुसलमान हो गये।

कैसे बिन मकसुअ, अम्र बिन मादि करब, तल्हा बिन खुलैंद रज़ियल्लाहु अन्हुम।

ये तीनों बड़े लोग थे तो जब हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का इन्तिक़ाल हुआ तो ये मुरिद हो गये

फिर दोबारा अल्लाह तआला ने तौफ़ीक दी फिर मुसलमान हो गए

तो हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा था

इन पर निगाह रखना और इनको इमारत न देना तो

उनके हालात मालूम करने के लिए हज़रत साद रज़ियल्लाहु अन्हु ने

तो तहक़ीक़ करवाई तो वह रावी कहते है

वे तीन जिसके बारे में शक था उनका हाल यह था

कि उन जैसा रात को कोई नहीं रोता था

और उन जैसा दुनिया से कोई बेज़ार नहीं था।

जिस पर शक था उनका यह हाल है।

जो शुरू से पक्के चले आ रहे थे वह कहाँ पहुँचे होंगे?

(मौलाना तारिक़ जमील साहब के इबरत अंगेज़ बयानात, सफ़ा न० 283)

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