हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ि. का चादर को जला देना…

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Hazrat Abdullah Bin Amr Razi. Ka Chadar Ko Jala Dena
Makkah
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Hazrat Abdullah Bin Amr Razi. Ka Chadar Ko Jala Dena

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र रज़ि. का चादर को जला देना

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस रज़ि. कहते हैं

कि एक मर्तबा सफर में हम लोग हुज़ूरे अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) साथ थे।

मैं हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) कि खिदमत में हाजिर हुआ।

मेरे ऊपर एक चादर थी जो कुसुम के रंग में हल्की सी रंगी हुई थी।

हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने देख कर फ़र्माया,

यह क्या ओढ़ रखा है? मुझे इस सवाल से हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की नागवारी के आसार मालूम हुए।

घरवालों के पास वापस हुआ तो उन्होंने चूल्हा जला रखा था।

मैंने वह चादर उसमें डाल दो। दूसरे रोज़ जब हाज़री हुई

तो हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़र्माया, वह चादर क्या हुई?

मैंने किस्सा सुना दिया। आपने इरशाद फर्माया,

औरतों में से किसी को क्यों न पहना दी। औरतों के पहनने में तो कोई मुज़ाइक़ा न था।

फायदा:

अगरचे चादर के जला देने की जरुरत न थी मगर जिस के दिल में किसी की नारज़गी की चोट लगी हुई हो,

वह इतनी सोच का मुतहम्मिल ही नहीं होता की उसकी कोई और सूरत भी हो सकती है।

हाँ मुझ जैसा नालायक होता तो न मालूम कितने एहतमालत पैदा कर लेता

कि यह न-गवारी किस दर्ज़े कि है और दर्याफ्त तो कर लूँ

और कोई सूरत इजाज़त कि भी हो सकती है या नहीं

और हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने पूछा ही तो,

मना तो नहीं किया वगैरह-वगैरह।

(फ़ज़ाइले आमाल, सफ़ा न० 158)

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