हज़रत सुमैया, उम्मे अम्मार की शहादत के बारे में जानिए हदीस पढ़ कर

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Hazrat Sumayya, Uumme Ammar Ki Shahadat Ke Bare Mein
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Hazrat Sumayya, Umme Ammara Ki Shahadat Ke Bare Mein

हज़रत सुमैया, उम्मे अम्मार की शहादत के बारे में

सुमैया रज़ि. बिन्ते ख़य्यात हज़रत अम्मार रज़ि. की वालिदा थीं,

जिनका क़िस्सा पहले बाब के सातवें नम्बर पर गुज़र चूका है।

यह भी अपने लड़के हज़रत अम्मार रज़ि. और अपने खाविन्द हज़रत यासिर रज़ि. की तरह इस्लाम की खातिर किस्म-किस्म की तकलीफें और मशक्क़तें बरदाशत करती थीं,

मगर इस्लाम की सच्ची मुहब्बत जो दिल में घर कर चुकी थीं,

उसे ज़रा भी फ़र्क़ न आता था। उनको सख्त गर्मी के वक़्त धुप में कंकरियां पर डाला जाता था

और लोहे की जिरह पहना कर धुप में खड़ा किया जाता था ताकि धुप से लोहा तपने लगे और उसकी गर्मी से तक़लीफ़ में ज़्यादती हो।

हुज़ूरे अक़्दस (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का उधर से गुज़र होता तो सब्र की तलक़ीन फ़र्माते और जन्नत का वायदा फ़र्माते।

एक मर्तबा हज़रत रज़ि० खड़ी थीं कि अबू जहल का उधर को गुज़र हुआ,

बुरा भला कहा और ग़ुस्से में बर्छा शर्मगाह पर मारा,

जिसके ज़ख़्म से इतिकाल फर्मा गई।

इस्लाम की ख़ातिर सबसे पहली शहादत इन्हीं की हुई।

फयदा:

औरतों का इस क़दर सब्र, हिम्मत और इस्तक़लाल क़ाबिले रश्क हैं।

लेकिन बात यह है कि जब आदमीं के दिल में कोई चीज़ घर कर जाती है,

तो उसको हर बात सहल हो जाती है। अब भी इश्क़ के बीसियों क़िस्से इस किस्म के सुनने में आते हैं कि जान दे दी,

मगर यही जान देना अगर अल्लाह के रास्ते में हो,

दीन की ख़ातिर हो दूसरी ज़िन्दगी में जो मरने के साथ ही शुरू हो जाती है,

सिर्खरूई का सबब है और अगर दुनियावी तो गई थी ही, आख़िरत भी बर्बाद हुई।

(फ़ज़ाइले आमाल, सफ़ा न० 191)

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