हज़रत उमर रज़ि का क़िस्सा, जानिए हदीस पढ़ कर

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 Hazrat Umar (Rz). Ka Qissa
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Hazrat Umar (Rz). Ka Qissa

हज़रत उमर रज़ि का क़िस्सा

हज़रत उमर रज़ि० जिनके पाक पर आज मुसलमानों को फख्र है

और जिनके जोशी ईमानी से आज चौदह सौ बर्ष बाद तक काफिरों के दिल में खौफ है,

इस्लाम लाने से क़ब्ल मुसलमानों के मुक़ाबले और तकलीफ़ पहुँचाने में भी मुमताज थे,

नबी अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के कत्ल के दरपै रहते थे।

एक रोज़ कुफ़्फ़ार ने मश्वर कि कमिटी कायम की कोई है जो मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को क़त्ल कर दे।

उमर ने कहा कि में करूँगा। लोगों ने कहा कि बेशक तुम्हीं कर सकते हो।

उमर रज़ि० तलवार लटकाये हुए उठे और चल दिए। इसी फ़िक्र में जा रहे थे कि एक साहब कबीला ज़ोहर के,

जिनका नाम हज़रत सअद बिन अबी वक़्क़ास रज़ि० है और वाज़ों ने और साहब लिखे हैं,

मिले। उन्होंने पूछा उमर रज़ि० कहा जा रहे हो?

कहने लगे कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के क़त्ल की फ़िक्र में हूँ।

(नऊज़ुबिल्लाह)

सअद ने कहा कि बनू हाशिम और बनू ज़ोहरा और बनू अब्दे मनाफ़ से कैसे मुत्मइन हो गये वह तुझको बदले में क़त्ल कर देंगे।

इस जवाब पर बिगड़ गए और कहने लगे कि मालूम होता है

तू बे-दीन (यानी मुसलमान) हो गया, ला पहले, तुझी को निपटा दूँ।

यह कह कर तलवार सौत ली और हज़रत सअद रज़ि० ने भी यह कह कर कि हाँ में मुसलमान हो गया हूँ,

तलवार सभाल ली। दोनों तरफ़ से तलवार चलने को थीं,

कि हज़रत सअद रज़ि० ने कहा कि पहले अपने घर तो खबर ले,

तेरे बहन और बहनोई दोनों मुसलमान हो चुके हैं।

यह सुनना था कि गुस्सा से भर गए और और सीधे बहन के घर गए।

वहां हज़रत खब्बाब रज़ि० जिन का जिक्र न० 6 पर गुज़रा किवाड़ बंद किए हुए

दोनों मियां-बीवी को क़ुरआन शरीफ पढ़ रहे थे।

हज़रत उमर रज़ि. ने किवाड़ खुलवाये।

इनकी आवाज़ से हज़रत ख़ब्बाब रज़ि० तो जल्दी से अन्दर छुप गए

और सहीफ़ा भी जल्दी में बहार ही रह गए,

जिस पर आयते क़ुरआन लिखी हुई थीं।

हमशीरा ने किवाड़ खोले। हज़रत उमर रज़ि. के हाथ में कोई चीज़ थी,

जिसका बहन के सर पर मारा, जिससे खून बहाने लगा और कह कि अपनी जान कि दुश्मन, तू भी बद-दीन हो गई।

इसके बाद घर में आये और पूछा कि क्या कर रहे थे और यह आवाज़ किस कि थी। बहनोई ने कह कि बात-चीत कर रहे थे,

कहने लगे, क्या तुमने अपने दीन को छोड़ कर दूसरा दीन इख़्तियार कर लिया? बहनोई ने कहाँ कि अगर दूसरा दीन हक़ हो तब! यह सुनना

था कि उनकी दाढ़ी पकड़ कर खींची और बे-तहाशा टूट पड़े और जमीन पर गिरा कर खूब मारा।

बहन ने छुड़ाने की कोशिश की तो उनके मुंह पर इस ज़ोर से एक तमंचा मारा कि खून निकल आया।

वह भी आख़िर उमर ही की बहन थीं, कहने लगीं, कि खून निकल आया।

वह भी आख़िर उमर ही कि बहन थीं,

कहने लगीं कि उमर इस वजह से मारा जाता है

कि हम मुसलमान हो गए।

बेशक हम मुसलमान हो गए हैं,

जो तुझसे हो सके तू कर ले।

इसके बाद हज़रत उमर कि निगाह उस सहीफे पर पड़ी जो जल्दी में बहार रह गया था

और गुस्से का जोश भी इस मार-पिट से काम हो गया था

और बहन के इस तरह में खून में भर जाने से शर्म सी भी आ रही थीं।

कहने लगे कि अच्छा मुझे दिखलाओ, यह क्या है।

बहन ने कह कि तू नापाक है और इसको नापाक हाथ नहीं लगा सकते।

हर चन्द इसरार किया मगर वह बे-वुज़ू और ग़ुस्ल के देने को तैयार न हुईं थी।

इसको पढ़ना शुरू किया और- इन्नी अनल्लाहुला इला ह इला अना फअबुदनी व आकिमिस्सला त लिज़ीक्री० तक पढ़ा था

कि हालात ही बदल गई। कहने लगे कि अच्छा मुझे भी मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) कि खिदमत में ले चलो।

यह अल्फ़ाज़ सुनकर हज़रत ख़ब्बाब अन्दर से निकले और कहा कि ए उमर! तुम्हें खुशखबरी देता हूँ

कि कल शब पंच में हुज़ूर अक़्दस (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने दुआ मांगी थीं कि या अल्लाह! उमर और अबू जहल में जो तुझे ज्यादा पसंद हो,

उससे इस्लाम को क़ुवतअता फ़र्मा। (ये दोनों कुवैत में मशहूर थे) मालूम होता है

कि हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) कि दुआ तुम्हारे हक़ में क़ुबूल हो गई।

इसके बाद हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) कि खिदमत में हाज़िर हुए और जुमा कि सुबह को मुसलमान होना था

कि कुफ़्फ़ार के हौसले पस्त होना शुरू हो गए। मगर फिर भी यह निहायत मुख़्तसर जमाअत थीं और वह सारा मक्का, बल्कि अरब इसलिए और भी जोश पैदा हुआ

और जलसे करके, मश्वरे करके, इन हज़रत को नापैद करने की कोशिश होती थी, और तरह-तरह की तदबीरें की जातीं थीं,

तहँ इतना ज़रूर हुआ कि मुसलमान मक्का कि मस्जिद में नमाज़ पढ़ने लगे। हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ि० फ़र्माते हैं

कि उमर का इस्लाम लाना मुसलमानों कि फतह थी और उनकी हिजरत मुसलामनों की मदद थीं और उनकी खिलाफत रहमत थीं।

(फ़ज़ाइले आमाल, सफ़ा न० 34)

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