जानिए वाक़्या मेअराज की कुछ खास बातें जो हुज़ूर ﷺ के साथ हुई

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Janiye Waqia e meraj ki kuch khas Baatein jo Huzur ﷺ ke sath hui
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Janiye Waqia e meraj ki kuch khas Baatein jo Huzur ﷺ ke sath hui

वाक़या मेअराज 620 ई० उम्र शरीफ़ 52 साल:

27 रजबुल-मुरज्जब दोशबा की शब आप अपनी चचाज़ाद बहन उम्मे हानी के मकान

पर इस्तेराहत फरमा रहे थे कि अचानक जिब्रीले अमीन हाज़िरे खिदमत हुए।

हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के तल्वों का बोसा लेकर फरमाया

“या रसूलुल्लाह! अल्लाह तआला ने आपको सलाम कहलवाया है

और और अर्श पर याद फरमाया है और आपकी सवारी के लिए बुराक भेजा है।

फिर आप बुराक पर सवार हो कर बैतुल-हराम पहुंचे।

वहां से मस्जिदे अक़्सा (बैतुल-मक़्दिस) में पहुंचे।

वहां जिब्रील अलैहिस्सलाम ने मक़ामे सखरा के चबूतरे पर खड़े हो कर अज़ान दी

और तमाम अबियाए किराम तकरीबन (एक लाख चौबीस हज़ार) ने

हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के मुक़्तदी बन कर

आपकी इमामत में नमाज़ अदा की फिर नबीए करीम अल्लाह के दीदारे शौक़ में निकल पड़े।

पहले आसमान पर हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से मुलाकात हुई

दूसरे आसमान पर हज़रत इब्राहिम से मुलाकात हुई,

ग़रज़ सभी आसमानों पर मुख़्तलिफ़ अबिया से मुलाकातें होती रही।

हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जब सातवें आसमान पर पहुंचे

तो नअलैन उतारने लगे तो आवाज़ आई “आओ

ऐ मेरे हबीब बेझिझक नअलैन पहने चले आओ।

” फिर मुहिब्ब व हबीब में राज़ व नियाज़ की बातें हुई।

नूर से नूर का मिलन हुआ।

हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को दिन और

रात के लिए पचास वक़्त की नमाज़ का तोहफ़ा मिला।

लैटते वक़्त हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से मुलाकात हुई

उन्होंने पूछा “क्या तोहफ़ा मिला?”

आपने बतलाया तो हज़रत मूसा ने कहा

आपकी उम्मत कमज़ोर और नातवा है।

इतने वक़्त की नमाज़ कैसे अदा करेगी?

आप जाए और कम कराए। आप आए

फिर मूसा अलैहिस्सलाम ने तख्फीफ के लिए कहा।

इस तरह आप नौ मरतबा दीदारे इलाही से मुशर्रफ हुए।

आखिर कार पांच वक़्त की नमाज़ मुकर्रर हुई।

जब आकाए नामदार (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) मेअराज पर पहुंचे।

सातों जन्नत, आठों दोज़ख़ का नज़्ज़ारा किया।

लोगों को मुख़्तलिफ़ गुनाहो की सज़ा काटते देखा कि हूर की आखों से खून के आंसू वह रहे हैं।

हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने सबब पूछा।

उसने बताया कि जब अल्लाह तआला दुनिया बनाते वक़्त उसका नक्शा तैयार कर रहा था

उसमें करबला का मक़ाम और उस मक़ाम पर होने वाले वाकेआत लौहे महफूज़ मे लिख रहा था

कि किस तरह हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्ला) के नवासों को जंग करके शहीद कर दिया जाएगा।

तीन दिन के भूखे प्यासों पर कैसे-कैसे ज़ुल्म व सितम तोड़े जाएगे। इस वजह से मेरे आंसू जारी हो गये।

अब करोड़ो साल रोते गुज़र गये आंसू तो खत्म हो गये

और अब उसकी जगह खून बह रहा है

जब हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) इतना लम्बा सफर तय करके लौटे

तो हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का बिस्तर गर्म था और दरवाज़े की ज़जीर भी हिल रही थी।

(तारीख़े आलम, सफ़ा न० 123)

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