हज़रत दावूद अलैहिस्सलाम का इतिहास हिंदी में भाग-1

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Hazrat Dawood Alaihissalam history In hindi part-2
Prophet Dawood Alaihisslam
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Hazrat Dawood Alaihissalam history In hindi part-1

हज़रत दावूद अलैहिस्सलाम का इतिहास हिंदी में भाग-1

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हज़रात दाऊद अलैहिस्सलाम

हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम ने 100 साल कि उम्र पाई, आप मूसा अलैहिस्सलाम से 599 साल बाद तशरीफ़ लाये (इसके दीगर अक़वाल भी मन्क़ूल हे) हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम के बेटे हैं, अपने 59 साल उम्र पाई, ये हुज़ूर नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से 1700 साल पहले तशरीफ़ लाये.

(हाशिया जलालें, सफ़ा न०-275)

(तज़किरातुल अम्बिया अलैहिस्सलाम, सफ़ा-282)

हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम कि इबादत

क़ुरआन शरीफ में अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है,

“हमारे बन्दे दाऊद अलैहिस्सलाम नेमतों वाले को याद करो बेशक वह बड़ा रुजू करने वाला है”

(सूरह साद, आयात-17)

हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम एक दिन रोज़ा रखते और एक दिन इफ्तार करते, ये दरअसल हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम का नफ़्स के खिलाफ जिहाद था क्यूंकि इन्सान का नफ़्स बच्चे कि तरह होता है बच्चे को एक दिन दूध पिलाया जाये और दूसरे दिन न पिलाया जाये ये बहुत मुश्किल है, इसी तरह दाऊद अलैहिस्सलाम ने अपने नफ़्स से ऐसा जिहाद किया जो आम आदमी के लिए बहुत मुश्किल था, क्यूंकि एक दिन नफ़्स को ख्वाहिशात से रोकना और दूसरे दिन ख्वाहिशात कि इजाज़त देना अज़ीम काम था।

हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम आधी रात अल्लाह तआला कि बारगाह में नवाफिल अदा करते, फिर रात का तिहाई (3) हिस्सा सोते, फॉर रात का चौथा (4) हिस्सा जाग कर इबादत में मशगूल रहते।

(तज़किरात अम्बिया अलैहिस्सलाम, सफ़ा-282)

हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम और सुलैमान अलैहिस्सलाम कि नबूवत

क़ुरआन ए मजीद में अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है,

“और बेशक हमने दाऊद अलैहिस्सलाम और सुलैमान अलैहिस्सलाम को बड़ा इल्म अता फ़रमाया और दोनों ने कहा सब खूबियां अल्लाह को जिसने हमें अपने बहुत से ईमान वाले बन्दों पर बुज़ुर्गी बख्शी”

(सूरह अल-नमल, आयत-15)

यहाँ इल्म से मुराद लोगों के दरमियाँ फैसलों का इल्म, परिंदों कि बोलियां जानने का इल्म वगैरा है, हमें बुज़ुर्गी बख्शी से मुराद नबूवत और जिन्नात व शैतानों को आपके ताबे’अ बनाना है।

इल्म से इन्सान को फ़ज़ीलत हासिल हुई, इन्सान को चाहिए कि नेमतों के हासिल होने पर उन का शुक्रिया अदा करे, किसी नेमतों का इज़हार बतौर तकब्बुर न-जायज़ है।

(रूहुल बयान, जिल्द-6, सफ़ा-619)

(तज़किरातुल अम्बिया अलीस्सलाम, सफ़ा-283)

हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम कि बादशाहत

क़ुरआन करीम में अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है,

“ऐ दाऊद (अलैहिस्सलाम) बेशक हमने तुझे ज़मीं में नयाब किया, तू लोगों में सच्चा हुक्म कर और ख्वाहिशात के पीछे न जाना कि तुझे अल्लाह कि राह से बहका देगी बेशक वो जो अल्लाह कि राह में बहकते हैं उनके लिए सख्त अज़ाब है इस पर कि वो हिसाब के दिन को भूल बैठे”

(सूअरः साद, आयत-26)

हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम को नबूवत और बादशाहत दोनों हासिल थी, हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम को अल्लाह तआला ने जो फ़रमाया “ख्वाहिशात के पीछे न जाना” इसका मतलब ये है कि आपको ख्वाहिशात के पीछे चलने से उम्मत कि तालीम के लिए रोका गया हे कि वो गौर और फ़िक्र करे, और हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम को जो हुक्म दिए गए हैं वो उनकी ताबेदारी करे, जब ये हुक्म दाऊद अलैहिस्सलाम को हो सकता है तो दूसरे को तो यक़ीनन ये हुक्म होना ही है।

(हाशिया जलालें, सफ़ा-382)

अगर बादशाह सरई अहकाम के मुताबिक फैसले करे तो निज़ाम अलाम दुरुस्त हो जाता है, भलाई दरवाज़े अच्छी तरीके से खुल जाते हैं, इन मकसद के पेशे नज़र कौम कि तालीम व तरबियत के लिए हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम को ये दिया गया।

(तज़किरातुल अम्बिया अलैहिस्सलाम, सफ़ा-283, 284)

पहाड़ और परिंदे हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम के पैरोकार

क़ुरआन पाक में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त इरशाद फरमाता है,

“बेशक हमने उसके साथ पहाड़ मुसख्खर फार्मा दिए कि तस्बीह करते शाम को और सूरज चमकते, और परिंदे जमा किये हुए सब उसके फार्मा बरदार थे”

(सूरह साद, आयत-18,19)

अल्लाह टाला ने पहाड़ों को हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम के साथ मुसख्खर कर दिया यानि पहाड़ आप के ताबे’अ (पैरोकार) थे, हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम जहाँ चलते पहाड़ आपके साथ चलते या आप जिस जगह पहाड़ों के लिए जाने का इरादा फरमाते पहाड़ वहां चलते जाते।

(सुब्हानअल्लाह)

हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम कि आवाज़ बहुत हसीं थी

हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम कि आवाज़ बहुत हसीं थी, आवाज़ में रौब और दब-दबा भी था, जब हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम हसीं आवाज़ से “ज़बूर शरीफ” पढ़ा करते तो पहाड़ों से भी हसीं व जमील गन-गुनाहट सुनाई देती।

हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम कि हसीं आवाज़ से ज़बूर शरीफ पढ़ते और तस्बीहात पढ़ने के साथ-साथ परिंदे भी तस्बीहात पढ़ते थे, (परिंदे) हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम के करीब आकर कान लगा कर सुनते थे, बल्कि बाज़ हज़रात ने बयान किया है कि हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम कि आवाज़ में अल्लाह तआला ने ऐसा अजीब असर रखा था कि आप जब ज़बूर शरीफ पढ़ते तो चलता पानी रुक जाता, दरख्तों पर ये असर होता कि गोया वो भी ज़बाने हाल से आपके साथ पढ़ रहते हैं, और उनके पत्ते झड़ने शुरू हो जाते।

(तफ़्सीरे कबीर, जिल्द-9, सफ़ा-171)

(तज़किरातुल अम्बिया अलैहिस्सलाम, सफ़ा-284,285)

सुब्हानअल्लाह, अल्लाहुअक्बर…

इसमें अल्लाह तआला कि क़ुदरत के कई कारनामे मुजूद हैं, पहाड़ों के जिस्म में ज़िन्दगी पैदा फरमाना, फिर उन्हें सऊर अता फरमाना, फिर उन्हें क़ुदरत से नवाज़ने फिर बोलने कि ताकत देना कि वो अल्लाह की तस्बीहात पढ़ें।

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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