दिन रात में सतरह” फ़र्ज़ क्यों मुक़र्रर हुए

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Din Raat Mein Satara Farz Kyun Muqarrar Huye
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Din Raat Mein Satara Farz Kyun Muqarrar Huye

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दिन रात में सतरह” फ़र्ज़ क्यों मुक़र्रर हुए

अल्लाहतआला ने अपनी मेहरबानी से हम आजिज़ बन्दों पर दिन-रात में सतरह रकअत फ़र्ज़ मुक़र्रर फरमाते हैं।

इनमें यह हिकमत है कि जो आदमी मर्द हो या औरत दिन चार फ़र्ज़ ज़ोहर के वक़्त और चार फ़र्ज़ अस्र के वक़्त हमेशा पढता रहेगा

तो अल्लाहतआला उसके लिए जन्नत के आठों दरवाज़े खोल देगा

कि जिस दरवाज़े से वह चाहे जन्नत में दाखिल हो जाये।

रात में तीन फ़र्ज़ मग़रिब के वक़्त और चार फ़र्ज़ इशा के वक़्त जो हमेशा पढता रहेगा

तो अल्लाहतआला उसके लिए सातों दरवाज़े दोज़ख के बन्द कर देगा

और दो फ़र्ज़ फ़ज़्र के वक़्त हैं, न वह दिन में हैं और न रात में।

जो शख्स इनको हमेशा पढता रहेगा अल्लाहतआला उसके दिन-रात के गुनाह माफ़ कर देगा।

मोहसिन-ए-आज़म हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने अपने असाहबों से फ़रमाया कि-

बतलाओ अगर किसी के घर के सामने साफ़ पानी की नहर बहती हो और वह घर वाला दिन-रात में पांच दफ़ा उसमें ग़ुस्ल कर लिया करे तो क्या उसके बदन पर कुछ मैल रहेगा?”

असहाबों ने अर्ज़ की या रसूल अल्लाह! कुछ भी मैल नहीं रहेगा।

आपने फ़रमाया- बस इसी तरह जो मर्द या औरत पांच वक़्त की नमाज़ हमेशा वक़्त पर पढता रहेगा,

उस गुनाह का मैल न रहेगा। ख़ूब याद रखो नमाज़ मेरी आँखों की ठण्डक है। क्योंकि-

 

मौला से अपने मिलता है बन्दा नमाज़,
उठ जाता है जुदाई का पर्दा नमाज़ में,।

आ पहुँचा खास अपने शहनशाह के हुजूर,
जब बन्दा हाथ बांध के आया नमाज़ में।

मौला में और बन्दे में रहता नहीं हिजाब,
बेपर्दा है तजल्ली ए मौला नमाज़ में।

जब हाथ उठाये बांध के नियत तो यूँ समझ,
दोनों जहाँ से हाथ उठाया नमाज़ में।

हम्दो सना दरूद क़िरत व दुआ सलाम,
है जमा हर तरह का वज़ीफ़ा नमाज़ में।

गर क़ब्र के अँधेरे से डर है तो पढ़ नमाज़,
है ज़ुल्मते लहद का उजाला नमाज़ में।

नरमी से करता है मलाकुल्मौत कब्ज़ जान,
सख़्ती-ए-मौत का है बचाब नमाज़ में।

यह कब्र में अनीस यह महशर में हो शफ़िह,
उक़्बा की रहतें हैं सरापा नमाज़ में।

(बाग़े-जन्नत यानी खुदाई बाघ, सफ़ा न० 237)

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