बीवी के हुक़ूक़ क़ुरानो सुन्नत की रौशनी में

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Biwi Ke Huqooq Qurano Sunnat Ki Roshni Me
Biwi Ke Huqooq
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Biwi Ke Huqooq Qurano Sunnat Ki Roshni Me

बीवी के हुक़ूक़ क़ुरानो सुन्नत की रौशनी में

बिस्मिल्लाह-हिर्रहमान-निर्रहीम!

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुरआन-ए-करीम में फरमाता है:

अल-क़ुरआन: “और बीवियों के साथ अच्छी तरह रहो सहो”

(सौराह(4) निसा; आयत 19)

अल-क़ुरआन: “औरतो का हक़ मर्दो पर वैसा ही है जैसा दस्तूर के मुताबिक़ (मर्दो का हक़) औरतो पर है, अल बत्ता मर्दो को उन पर फ़ज़ीलत हासिल है”

(सौराह(2) बक़रह; आयत 228)

इसी तरह अल्लाह के रसूल (ﷺ) की अहादीस में आता है के:

मफ़हूम-ए-हदीस: “औरतो से बेहतर सुलूक करो क्यूंकि औरत पसली से पैदा की गए है और पसली का सब से ज़्यादा टेढ़ा हिस्सा वह है जो उसका बुलन्द हिस्सा है,

अगर तू उसे सीधा करने लगे गए तो उसे थोड़ देगा और अगर छोड़ देगा

तो टेढ़ी ही रहेगी, लिहाज़ा औरतो से अच्छा सुलूक करो”

(भुखारी 3331)

मफ़हूम-ए-हदीस: “कोई मोमिन मर्द, मोमिना औरत, यानी अपनी बीवी से भुगज (नफरत) न रक्खे,

क्यूंकि अगर उस से उस की कोई आदत नापसंद है तो कोई दूसरी पसन्द भी होगी”।

(मुस्लिम 1467)

मफ़हूम-ए-हदीस: “और दस्तूर के मुताबिक़ तुम्हारी बीवियों की खुराक और पोशाक तुम्हारे ज़िम्मे है”।

(अबू दावूद 1905)

मफ़हूम-ए-हदीस: रसूल’अल्लाह (ﷺ) से पहुंचा गया के बीवी का मर्द पर क्या हक़ है तो आप ने फ़रमाया के

जब तू खाना खाए तो उसे खाना खिला और जब तू पहने तो उसे भी पहनना और उसके मूह पर न मार,

उसे बुरा भला कहे न उस से क़ता ताल्लुक़ कर मगर यह के घर के अन्दर अन्दर”

(अबू दावूद 2142)

वज़ाहत: यानी किसी बात पर नाराज़ हो तो उसे घर से दूसरी जगह न भगाओ

मफ़हूम-ए-हदीस: “जिस की दो बीविया हो और वह उन में से एक की तरफ ही मईल (Atract) हो तो वह क़यामत के दिन इस हाल में आएगा के उसका एक पहलु झुका होगा”

(अबू दावूद 2133)

अलबत्ता वह उमूर जीन में अदल मुमकिन न हो जैसे मोहब्बत और दिल की ख़ुशी तो इन पर खाविंद पर खुश गुनाह नहीं,

अल्लाह तआला क़ुरआन में फरमाता है के

“अगर तुम चाहो भी तो अपनी बीवियों के दरमियान अदल न कर सकोगे”

(सौराह (4) निसा; आयत 129)

मफ़हूम-ए-हदीस: रसूल अल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया के

“ए अल्लाह! यह मेरी तक़सीम ऐसे मुआमले में है जिस में मेरा इख्तयार है और जिस बात में तेरा इख्तयार है, मेरा नहीं उस पर मुझे मलामत न फरमाना”

(अबू दावूद 2134)

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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