मक़बूल हज का कोई बदला नहीं सिवाए जन्नत के

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Maqbool Hajj Ka Koi Badla Nahi Siwaye Jannat Ke
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Maqbool Hajj Ka Koi Badla Nahi Siwaye Jannat Ke

मक़बूल हज का कोई बदला नहीं सिवाए जन्नत के

मफ़हूम-ए-हदीस: अबू हुरैरा (रज़ि” अल्लाहु अन्हु) से रिवायत है की,

रसूल” अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया

“एक उमराह से दूसरे उमराह तक जितने गुनाह हो उमराह उसका कफ़्फ़ारा बन जाता है

और मक़बूल हज का कोई बदला नहीं सिवाए जन्नत के।

(सुनें इब्न मजह, भाग1, हदीस न०,1045 (सहीह)

हज एक ऐसी इबादत है जो तमाम साहिबे इस्तेहात मुसलमानो पर फ़र्ज़ है

लेकिन हज की नियत सिर्फ अल्लाह की इबादत हो, और दिखावे से पाक हो।

बिल्खुसुस हज वो इबादत है जो दिख कर आती है

और अल्लाह के नज़दीक ऐसी इबादत हरगिज़ क़ाबिले क़बूल नहीं जिसमे रियाकारी शामिल हो,

रियाकारी का मायने होता है “लोगों में शौहरत के वास्ते अपने अमाल का चर्चा करना,

ऐसी इबादत जो खालिस अल्लाह के लिए करनी होती है लेकिन हम उसे लोगों को दिखावे के लिए करते है ताकि लोग हमारी तारीफ करे, इसे रिया कहते है,

इन शोरत लोगों से तारीफ की उम्मीद में अमल करना रिया है।

रिया की तबहकारिया

रसूल” अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) फरमाते है।

“रिया का अदना मर्तबा भी शरीक है”

(इस्लामी अख़लाक़-ओ-आदाब, हदीस-7, पेज-302)

शिर्क करने का नुक्सान क्या है? हम सब जानते है शिर्क ऐसा गुनाह है जिसकी कोई मुआफी नहीं

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुरआन में फरमाता है “जिसने अल्लाह के साथ किसीको शरीक ठहराया,

अल्लाह ने उस पर जन्नत हराम कर दी, उसका तीखाना जहन्नम है और ज़ालिमों का कोई मददगार न होगा”

(अल-क़ुरान 5:72)

अल्लाह तआला हमे पढ़ने सुनने से ज्यादा अमल की तौफ़ीक़ दे,

हमे अपने हज और दीगर फ़राइज़ को रियाकारी के फ़ित्नों से पाक रखने की तौफ़ीक़ अत फरमाए,

हम तमाम को बेशुमार इल्म और अमल की तौफ़ीक़ दे।

व आखीरु दवना अनिलहम्दुलिल्लाहे रब्बिल आलमीन!

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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