रसूल अल्लाह(ﷺ) की आखरी वसीयत

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Rasool Allah(ﷺ) Ki Aakhri Wasiyat
sallallahu alaihi wasallam
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Rasool Allah() Ki Aakhri Wasiyat

बिददत की हकीकत:

रसूल’अल्लाह( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ) की आखरी वसीयत…

मफ़हूम-ए-हदीस: रसूल’अल्लाह( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ) ने एक रोज़ खुत्बा दिया।

एक सहाबी-ए-रसूल अरबाज़ बिन सरियाः (रज़ि’ अल्लाहु अन्हु ) उठे और कहने लगे के

“या रसूल’अल्लाह ( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ) मुझे डर है, मुझे ऐसा गुमान है के कही ये आपका आखरी खुत्बा तो नहीं।

लिहाजा कुछ नसीहत और वसीयत कर जाईये हमे (गोया इस ख़ुत्बे की बात एक वसीयत है

नबी की तरफ से अपनी उम्मत को, अगर इसको समझ गए तो हम कामियाबी हो गए)

तो रसूल’अल्लाह (ﷺ) ने फ़रमाया और कहा:

फ-इन्ना खैरल हदीसी किताबुल्लाहi! (सबसे बेहतरीन बात! अल्लाह के किताब की बात है)

व खैरल हदयी-हदयू मुहम्मदिन( सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम )! (सबसे बेहतरीन तरीका! तरीका-ए-मोहम्मद (ﷺ) का है,)

व-शर-रेल उमूरी मुँह-दसा-तुहा! (सबसे बदतरीन काम “दीन में ईजाद करदा चीज़े है”)

व-कुल-ला-मुँह-दा-सतीं बिदेह! (और हर ईजाद करदा चीज़ बिददत है।)

व-कुल-लू बिद-अतुन ज़लाला! (और हर बिददत गुमराही है।)

व-कुल-लू जला-ला-तीन फिन-नार (और हर गुमराही का ठिकाना जहन्नम की आग है।)

(अबू दावूद, तिर्मिज़ी)

(सुनें इब्न माजा, भाग-1, हदीस-43)

(बुखारी: 3197, मुस्लिम: 4822, अहमद: 11372)

(तिरमिधि: 2565, हाकिम मुसतदरक, 1:218)

ये खुत्बा रसूल’अल्लाह(ﷺ) ने दिया और फिर आगे फ़रमाया, (अबू दावूद की रिवायत में अल्फ़ाज़ ज्यादा है)

आगे आप (ﷺ) ने फ़रमाया:

तरखतु-फीकुन-अमरें (मै तुम” में 2 हुक्म छोड़े जा रहा हूँ )

लता-जिल्लु-माँ-तमसाक-तुम्बी-हिमा (तुम हरगिज़ गुमराह न होंगे जब तक इन्हे थामे रहोगे)

कितबुल्लाही-व-सुन्नतिहि (अल्लाह की किताब और मेरी सुन्नत)

ये रसूल’अल्लाह (ﷺ) की वसीयत थी आपकी उम्मत के लिए

उस सहाबी का डर यही था के आपके जाने के बाद वही का सिलसिला बंद हो जायेगा!

फिर कौन हमे बताएगा के सही क्या है और गलत क्या।

तो कह दिया रसूल’अल्लाह (ﷺ) ने “के मै तुम में 2 हुक्म छोड़े जा रहा हो और वो है अल्लाह की किताब और उसके रसूल की सुन्नत।

बस तुम जबतक इन्हे थामे रहोगे तब तक ठोकर न खाओगे।

इसके आगे भी आप (ﷺ) ने फ़रमाया और कहा

व सुन्नति खुल्फ़ए राशिदीन व मेहदियीं (यानी खुलफाये राशिदीन और मेहदियीं की सुन्नत पर जब तक रहोगे तब तक तुम गुमराह नहीं होंगे।)

तो रसूल”अल्लाह (ﷺ) ने उम्मत को जो आखरी वसीयत और नसीहत की वो बिददत के ताल्लुक से की।

के  “बिददत मत करना मेरे इस दीन में

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