अल्लाह के ख़ास बन्दों की पहचान क्या है

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Hadees – Yahudiyao Ka Huzoor Ki Nabuwat Per Yaqeen Rakhna
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Allah Ke Khaas Bando Ki Pehchan Kya Hai

तक़दीर के बारे में कुछ रिवायते

मफ़हूम-ए-हदीस: तक़दीर पर ईमान रखना फ़र्ज़ है।

इस के बारे में ज़्यादा बहस और ग़ौर और फ़िक्र करने से सहाबा-ए-किराम को भी मना फरमा दिया गया था।

इस के बारे में ज़्यादा बहस करना हलाकत का सबब है।

(तिर्मिज़ी हदीस नो, 2133)

दुनिया में जो कुछ भलाई या बुराई होने वाली थी।

उन तमाम को अल्लाह तआला अफ़ज़ल से ही जनता है।

और उस ने अपने इल्म के मुवाफ़िक़ उन तमाम बातों को लिख दिया है।

जो शख्स जैसा करने वाला था। अल्लाह तआला ने उसकी तक़दीर में वही लिखा।

ये नहीं के अल्लाह तआला ने जैसा लिख दिया अब बन्दे को मजबूरन वैसा ही करना पड़ेगा।

बुरा काम करके ताकदीर की तरफ मंसूब कर देना।

या ये कहना के अल्लाह ने ऐसा ही चाहा तो मै ने ऐसा कर दिया।

ये बहुत ही बुरी बात है, बल्कि हुक्म ये हैi के नेक कामों को तक़दीर की तरफ मंसूब करे।

और बुरे काम को अपने नफ़्स की शरारत समझे।

तक़दीर (क़ज़ा) की तीन क़िस्में बयान की गई है।

(1) क़ज़ा-ए-मुंब्राम– ये अटल फैसला होता है, किसी भी तरह नहीं बदलता।

जब खास बन्दे उसके बारे में कुछ सिफारिश करना चाहते है तो पहले ही बता दिया जाता है के ये अटल फैसला है।

इस मुआमले को छोड़ दो, जैसे के अल्लाह तआला इब्राहिम (अलैहि सलाम) से फरमाता है।

अल-क़ुरआन: “ए इब्राहीम! इस मुआमले में मत पड़ो।

बेशक तुम्हारे रब का हुक्म आ चुके और उन (मुशरिको) पर ऐसा अज़ाब आने वाला है जो फेरा नहीं जाएगा।

(सौराह हूद आयात न० .76)

(2). क़ज़ा-ए-मुअल्लक़–यानी ये अटल फैसला नहीं होता, बल्कि बन्दे की नेकीओं और कोशिशों से वह फैसला बदल सकता है, जैसा के एक हदीस शरीफ में है।

मफ़हूम-ए-हदीस: “यानी, हर सूरत में भलाई है, उसकी कोशिश करो जो तुमको फ़ायदा दे , और अल्लाह से मदद मानगो, आजिज़ मत बने रहो।

(मुस्लिम शरीफ : हदीस नo.2664)

(3) क़ज़ा-ए-शिबू मुंब्राम– यानी! फरिश्तों के किताब में तो उसको ‘मुंब्राम’ लिख दिया जाता है,

मगर! अल्लाह तआला के इल्म में उसको मुआएलक के दर्जे में रखा जाता है,

उसको बहुत ही खास और मुक़र्रब बन्दों की सिफारिश और खास दुआओं के ज़रिए तब्दील किया जा सकता है।

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