जानिए, सुन्नत की अहमियत

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Sunnat Ki Ahmiyat
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सुन्नत की अहमियत:

मोहब्बत किसको कहते है

आईये एक मिसाल दे दू मोहब्बत की के मोहब्बत किसी चीज़ का सिर्फ नाम नहीं मोहब्बत।

बल्कि मोहब्बत का मतलब होता है इताअत

अगर मै ये कहुँ आप के मै अपने वालिदैन से मोहब्बत करता हो! तो क्या तसव्वुर करोगे आप मेरे बारे में

शायद उनकी खिदमत करता हूँ, रातो में उठकर पैर दबाता हूँ, कभी अरे-तुरीय न कहता हो, उफ़ भी न करता हो!

यही सारी बाते ख्याल करोगे न आप मेरे बारे में

मतलब मेरी मोहब्बत को इताअत में आप तसव्वुर करोगे,

लेकिन अगर मै आपसे कहुँ के मै अपने वालिदैन से मोहब्बत करता हूँ! और उनको मरता हूँ! तो क्या आप इसको मोहब्बत कहोगे। नहीं! बिल्कुल भी नहीं

तो अगर मै कहता हूँ के रसूल ’अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से मुझे मोहब्बत है तो इताअत लाज़िम है उसके साथ इताअत के बगैर मोहब्बत बेकार है।

लेकिन जिस तरह से आज मोहब्बत के नारे लगते है, (सुब्हान’अल्लाह)

इताअत कहा है मेरे भाईयो? वह तो सब मनमानी चल रही है।

फिर रसूल अल्लाह से मोहब्बत के दावे है।

जबकि मोहब्बत का लाज़मी ज़ुज़ इताअत है, फरमाबरदारी है, इत्तेबा है।

उस तरीके पर चलना है उसके पसन्द को पसन्द करना है,।

उसकी नापसंद को नापसंद करना है,।

उसकी अच्छाई को अच्छाई समझना है।

, उसने जिसको बुरा समझा उसको बुरा समझना है,।

उसने जो किया वो करना है, उसने जो न किया वो

नहीं करना है, ये है मोहब्बत, और यही है इताअत

तो बहरहाल! हमारे लिए ये जरुरी है के रसूल’अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को हर मुआमलो में आइडियल और रोले मॉडल बनाये जैसा के क़ुरआन ने हमे हुक्म दिया।

अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने क़ुरआन में मुख्तलिफ मुक़ामात पर,

इतने मुक़ामात है के हमारे लिए गिनना मुश्किल है जहा रसूल’अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की इत्तेबा का हुक्म दिया हमे इतने मुक़ामात जिसकी कोई इन्तहा नहीं

लेकिन इसके बावजूद आज इताअत और फरमाबरदारी के मुआमले में क्या हमारा हाल है।

के आज हमारी ज़िन्दगी का कोई भी शोभा उठा लीजिये वो सुन्नत से खाली है

अगर सहाबा इस दौर में आ जाते तो शायद वो हमको मुस्लमान भी न मानते।

के कैसा आज का मुस्लमान है ये: के रसूल की सुन्नतों पर उन्होने जान दी और ये आज का मुस्लमान रसूल को रसूल मान कर जान देना तो दूर सुन्नत पर अमल भी नहीं करता।

सहाबा की मोहब्बत कैसी थी रसूल अल्लाह से

रसूल’अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम) की सुन्नत और आपकी इताअत और आपकी इत्तेबा और मोहब्बत सहाबा के ज़िन्दगी में कैसी थी आईये एक ही वाकिये के जरिए बताने की कोशिश करते है।

हम ये वाकिया आपने सीरत में पढ़ा है:

एक सहाबी को मुशरिकों-ए-मक्का ने गिरफ्तार किया और फांसी देने का इरादा किया

कहा के: “ईमान छोड़ दो वरना फांसी दे दी जाएगी

उस सहाबी ने कहा: “ईमान तो नहीं छोड़ सकता! फांसी चाहो तो दे दो ।

वो कहने लगे के: “अच्छा चलो तुमको माफ़ कर देते है, सिर्फ तुम अपने रसूल को गाली दे दो।

तो उस सहाबी ने जवाब दिया के: “मेरे रसूल’अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को बुरा भला कहना तो दूर, रसूल’अल्लाह को काँटा भी चुभ जाये वो

तसव्वुर भी नहीं कर सकता मै तुमको जो चाहे मेरे साथ करना है करो,” और उनको फांसी दे दी गयी और शहीद कर दिया गया।

तो रसूल’अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की इत्तेबा और मोहब्बत कैसी थी सहाबा के ज़िन्दगी में! के रसूल’अल्लाह को काँटा भी चुभ जाना महल था उनके लिए,

लेकिन आज इत्तेबा-ए-रसूल, कलमा-ए-रसूल पढ़कर आज तमाम ज़िन्दगी के शोबे हम उसके बरख़िलाफ़ जाते है। (अल्लाह खैर करे)

और सहाबा का वो जस्बा था के उनकी जिंदगी का कोई शोभा सुन्नत से खाली न था

हां! अगर कोई बात मालूम न थी तो वो तहक़ीक़ कर लेते, दुसरो से पूछ लेते और अपनी इस्लाह कर लेते

लिहाजा हमे भी चाहिए के अपने ज़िन्दगी के तमाम शोबो में रसूल’अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की इत्तेबा, फरमाबरदारी को लाज़िम और फ़र्ज़ जाने

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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