जहेज़ की हकीक़त और उसके नुक़सानात

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Jehez ki Haqeeqat aur Uske Nuksanat
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Jehez ki Haqeeqat aur Uske Nuksanat

जहेज़ की हकीक़त और उसके नुक़सानात

ये वो मौजू है जिस पर अगर तफ्सील से लिखा जाये तो रुकना मुश्किल है, बहरहाल फिर भी हम इस टोपिक पर जहाज़ के ताल्लुक से कुछ अहम तज़किरा करने की कोशिश करेंगे।

सबसे पहली बात अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने क़ुरआन में फ़रमाया:-

मर्द औरतो पर क़वाम है इसीलिए के अल्लाह तआला ने उनमे से एक को दुसरे पर फ़ज़ीलत दी है और इसीलिए के मर्द अपना माल खर्च करते है

 अल-क़ुरान (सौराह निसा: आयत न०, 34)

तो कमाने का जिम्मा अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने मर्द को दिया
लेकिन आज फिर भी देखा जाता है के हमारे मर्द हज़रात अपनी मर्दानगी दाव पर लगाकर ससुराल वालो से जहाज़ (Dahej) तलाब करते है, माशा’अल्लाह

ताज्जुब की बात है ऐसे लोगो को वो वालिदैन अपनी बेटी कैसे दे देते है जो जहाज़ तालब करके अपने भिकारी होने का ऐलान करता है।
हो सकता है के मेरी बात कड़वी लगे, लेकिन जब हम इसकी तबहकारियो पर गौर करेंगे तो इन्शाअल्लाह-उल-अज़िज़ इस जहेज़ जैसी लानत से परहेज़ करेंगे,

जहाज़ के नुक़सानात:

निकाह का सुन्नत तरीका इख़्तियार न करने की वजह से आज मुआशरे में निकाह बहुत मुश्किल हो गए है और इसके नुक़सानात तो अनगिनत है, इतना मुमकिन नहीं के तमाम का हम तज़किरा कर पाए, बस कुछ ही अहम (Points) रखने की कोशिश करता हूँ

1). ज़िना और बड़दकारिया आम हो गई

गैरशरायी रुसुमत की वजह से निकाह महंगे हो गये जिसकी वजह से गरीब घर की बच्चिया घर बैठी है, सिर्फ इसलिए के उनके वालिदैन के पास उतने पैसे नहीं के वो रुसुमत करे और जहेज़ दें

नतीजतन अफेयर्स आम हो गये, ज़िना और बड़दकारिया बिलकुल आम हो गई, जबकि शरीयत का हुक्म तो ये है के “निकाह इतना आसान करो के ज़िना मुश्किल हो जाये”

आज उम्मत की जितनी नौजवान बेतिया घर बैठी है, अफेयर्स कर रही है, वो कही न कही इस जहाज़ के निज़ाम की शिकार है, और इसमें वो लोग भी बराबरी के जिम्मेदार है जिन्होंने जहेज़ की लानत को शरीयते इस्लामिया का हिस्सा बना लिया, “अल्लाह रेहम करे”,

2). हराम कमाई के लिए बाप मजबूर हो जाता है

बाप अपनी बेटियों के निकाह के लिए ज़िन्दगी भर म्हणत करता है, अपना ज़मीर दाव पर लगाकर अपने रब की नाफरमानी करता है, रिश्वतखोरी, हत्ता के सूद पर क़र्ज़ लेकर जहेज़ अदा करता है, सिर्फ इसी लिए क्यूंकि उसे अपने बेटी का निकाह करना है, अपने बेगैरत दामाद की झोली भरना है,

3). भाई का निकाह मुश्किल हो जाता है

बेटी के निकाह के खातिर बाप अपनी साड़ी जमा-पूंजी लगा देता है, हत्ता के कभी कभार बेटे का निकाह करना मुश्किल हो जाता है और फिर मजबूरन वो बीटा अपने ससुराल वालो से जहाज़ तालब करता है

4). खुदखुशिया (Suicide) आम हो रही है

जहाज़ अदा न करने की वजह से ख़वातीन पर आये दिन ज़ुल्मो सितम की खबरे आम हो रही हैं, नतीजतन बात खुदखुशी (Suicide) तक भी जा रही है,

5). बच्चियों को कोख में ही मार दिया जाता है (Abortion/Female Infanticide)

माँ की कोख में लड़का है या लड़की ये अक्सर लोग सोनोग्राफी के जरिए पता लगाकर उसे कोख में ही मार देते है, महज इसलिए के बड़ी होने पर उसकी शादी और दजेह का खर्चा वो वालिदैन नहीं बर्दाश्त कर पाएंगे, लिहाजा दुनिया में आने से पहले ही उसका मामला ख़त्म कर दो, नौज़बिल्लाह!

जबकि हम भूल रहे हैं की अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ऐसी बच्ची से रोज़े क़यामत सवाल करेगा के:-

“बीएई ज़ाम्बी कुटिलत” किस गुनाह पर मारी गई. – [Al-Quran 81:9]
यानी ऐसे वालिदैन पर रोज़े-क़यामत अल्लाह तआला नज़र-ए-रेहमत तो दूर उनसे बात करना भी पसंद नहीं करेगा,

कितने अफसोस की बात है, मेरे अज़िज़ भाइयो, आखिर जहेज़ की डिमांड करके क्या ऐलान करते है हम लोग? के – “मुझे अपने रब पर तवक्कुल नहीं, अपनी मर्दानगी पर यकीं नहीं के मैं म्हणत करके अपने बीवी बच्चो को खिला सकू! लीजहा मुझे अपने सुसराल वालो से जहेज़ की शक्ल में भीक लेने की जरुरत पड़ी है” (Subhan’allah !!!)

और वो वालिदैन क्या सोच कर जहेज़ देते हैं के:-

“मेरी बच्ची मुझपर बोझ है लिहाजा उसका घर बसने के लिए मुझे रिश्वत देनी पड़ रही है”

अल्लाह रहम करे, किस दीन पर चल रहे है हम?

क्यों हम शरीयत का पाकीज़ा हुक्म भूल गये के इस्लाम में मेहर अदा करने का हुक्म है जो की लड़की का हक़ है के उसे मेहर मिले,

क्या ससुराल वाले तोहफे दे सकते है?

अब सवाल ये आता है के अगर ससुराल मालदार हो और वो अपने दामाद को कुछ तोहफा देना चाहते हों तो क्या लेना दुरुस्त है, बहरहाल इसमें कोई हर्ज़ नहीं, लेकिन कोशिश करे की न ही ले, इसीलिए के ये जहाज़ का Alternate Solution बन जायेगा, एक Culture बन जायेगा, और इतनी अकल तो हम सबमे है के तोहफे मांग कर नहीं लिए जाते,

आज जरुरत है के हमे उठ खड़ा होना है जहेज़ जैसी लानत के खिलाफ,

इसीलिए के आज ये उम्मत में नासूर की तरफ लग गई है, जिसकी वजह से निकाह मुश्किल होगये, और हमारे नौजवान बड़दकारियो की तरफ रुजू कर गये, हत्ता के वालिदैन की इज़्ज़त भी दाव पर लगा ली!!

मेरे अज़ीज़ो! मकसद मेरा किसी की बुराई करना नहीं, कोशिश है के ये पोस्ट हमारे गैरतमंद मुसलमान मर्दो के ज़मीर को जिंझोड़ दे, और रब पर तवक्कुल मजबूत कर ले, निकाह को आसान करे,

फिर इन्शाअल्लाह-उल-अज़ीज! अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ऐसे लोगों को रुस्वा नहीं करेगा, जो ज़िन्दगी के तमाम मु’आमले में दीन-ओ-शरीयत की पाकीज़ा सुन्नतों को तरजि देते हैं,

आज अगर सिर्फ हूयमर नौजवान मर्दो ने ठान ली के कुछ भी हो जाये मैं जहेज़ नहीं लूंगा, तो इन्शाअल्लाह-उल-अज़ीज! एक इंक़लाब आएगा,

और मैं उन तमाम वालिदैन से भी दरख्वास्त करना चाहता हूँ के:-

“वो अपनी बच्चियों को दीनी और दुनियावी तालीम से आरास्ता करे, उन्हें इतना दीनदार बनाये के इन्शाअल्लाह-उल-अज़ीज! मर्द हज़रात ज्यादा से Jyada मेहर अदा करके उनसे निकाह करना चाहे,

तो बहरहाल हमे जरुरत है सुन्नत निकाह की अहमियत को समझे, इसे खूब आम करे, और जितना हो सके जहेज़ जैसी लानत से अपने और अपने मु’आशरे को बचने की कोशिश करे

इन्शाअल्लाह-उल-अज़ीज

  • अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त हमे निक़ाहों को आसान और सादगी से करने की तौफीक दे,
  • हमे तमाम गैरशरायी रसूमात से एहतियात करने की तौफीक दे,
  • जब तक हमे ज़िंदा रखे इस्लाम और ईमान पर ज़िंदा रखे
  • खत्म हमारा ईमान पर हो

**व आखीरु दवाना अनिलहम्दुलिल्लाहे रब्बिल आ’लमीन**

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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