क़ुरआन के नुज़ूल का असल मकसद, जानिए

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Quran Ka Nuzool Ka Maqsad
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Quran Ka Nuzool Ka Maqsad

क़ुरआन के नुज़ूल का असल मकसद

आज इल्म की कमी की वजह से हम नुज़ूल-ए-क़ुरआन के असल मकसद से महरूम रह गए,

और सिर्फ सवाब के लालच में क़ुरआन का इस्तेमाल करने लग गए।

जैसे मिस्साल के तौर पर हमारी मुसलमान बहने सवाब के लिए क़ुरआन अरबी में पढ़ती रहती हैं,

और पढ़ते हुए सौराह निसा की आयत 3 आती है “जहा अल्लाह तआला फरमाता है के ए मुसलमान मर्द आदमी तुम 2,3,4 बीवियों से निकाह कर सकते हो।

अब इन्होने पढ़ा अरबी में और अल्लाह से दुआ की के “ए अल्लाह हर हर्फ़ के बदले 10-10 नेकी होना:-

लेकिन जब इनका शौहर कभी दूसरा निकाह करने गया तो “कैसा करता देखती मै” माशाअल्लाह

अरे लेकिन क़ुरआन में हुक्म है न!

“होंगे क़ुरआन में लेकिन मुझे क्या:-

सुब्हानअल्लाह! अंदाज़ा भी है क्या सुलूक करते है हम अल्लाह की नाज़िल कर दे हिदायत का,

ज़िन्दगी भर हम इसे महज सवाब के लालच में ही पढ़ते है लेकिन कभी इसके माने मफ़हूम पर गौर व फ़िक्र नहीं करते,

जबकि सवाब तो बोनस है वो तो मिल जायेगा इंशा’अल्लाह

अलहम्दुलिल्लाह! क़ुरआन की तिलावत की फैज़लात अपनी जगह है,

लेकिन क़ुरआन का असल मकसद इसाइयत की हिदायत है जिसके ताल्लुक से अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुरआन-ए-करीम में फरमाता है के:-

ए नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)! ये मुबारक किताब (क़ुरआन) है

जिसे हमने आपकी तरफ इस लिए नाज़िल किया के लोग इसकी आयतो पर गौर करे और अक़लमंद इस से नसीहत हासिल करे,

(अल-क़ुरआन सौराह (38)साद: आयात-29)

तो क़ुरआन के नुज़ूल का असल मकसद हिदायत है, लेकिन फिर भी हम इसे महज़ सवाब के लिए पढ़ते है,

यही वजह है के हम अल्लाह की हिदायत से महरूम रह गए,

और जहालत हम पर तारी हुई, जिसका फायदा उम्मत के बाज़ शरर पसन्द लोगो ने खूब उठाया,

“हमे मस्लकी और फ़िरक़ावरीयत में उलझाया, क़ुरआन से हिदातर हासिल करने के बजाये इसे मुर्दो पर बखस्वय,

बेशुमार बिद्दते ईजाद कर इन्होने अपनी बातिल दुकाने खूब चलायी लेकिन कभी हमे क़ुरआन के असल मकसद से तरफ नहीं करवाया, सिवाय उलेमाए हक़ के:-

लिहाजा मेरे अज़ीज़ो! आज अगर हमे ज़िल्लत और रूज़्वाई से बहार निकलना है तो हमे चाहिए के हम क़ुरआने करीम की हिदायत को समझे,

इसके माने मफ़हूम पर गौर करे, और जितना हो सके इस पर खुद भी अमल करे और दुसरो को भी इसकी दावत दे।

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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