माँ-बाप की खिदमत से महरूम न रहो

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NEKI AUR PAREZGAARI ME EKH DUSRE KI MADAD KARO
Maan-Baap Ki Khidmat
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Maan-Baap Ki Khidmat Se Mehroom Na Raho

माँ-बाप की खिदमत से महरूम न रहो

मफ़हूम-ए- हदीस: रिवायत किया गया है हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) 3 मर्तबा फरमाते है की,

उसकी नाक खाक आलूदा हो,

हज़रते अबू हुरैरह (रज़िअल्लाहु अन्हु) अर्ज़ करते है , किसकी या रसूल’अल्लाह।

हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहे वसल्लम) इरशाद फरमाते है। उसकी जिसने बूढ़े माँ बाप या उनमे से एक को पाया और जन्नती न हुवा,

(मुस्लिम शरीफ )

सबक़ इस से मुराद ये की वह माँ -बाप की खिदमत न कर पाया, न उनके लिए माल खर्च कर पाया और न ही उनको कभी खुश रख पाया।

औरत के लिए उसकी शादी के बाद शौहर के हक़ से ज़्यादा कोई चीज़ बढ़ कर नहीं होती, मगर मर्द के लिए हमेशा वालेदैन का हक़ चाहे वह शादी कर ले या कुंवारा रहे, हर हाल में वालेदैन का हक़ वैसा ही बढ़ कर रहता है।

अल्लाह ताअला हमें अपने वालिदेन से हुस्न-सुलुखी, अदब-ओ-एहतराम से खिदमत करने की तौफीक अता फरमाए:-

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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