शफ़ाअत-ए-मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम 20 हदीस व क़ुरआन की रौशनी में

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Shafaat-E-Mustafa Sallallahu Alaihi Wasallam
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Shafaat-E-Mustafa Sallallahu Alaihi Wasallam 20 Hadees Wa Quran Ki Roshni Me

शफ़ाअत-ए-मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम 20 हदीस व क़ुरआन की रौशनी में

हम अहले सुन्नत वाल जमाअत (मसलक-ए-आलाहज़रत/हनफ़ियत) का ये अक़ीदा है के अल्लाह तआला रोज़े महशर अपने मेहबूब (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) को ख़ास मक़ाम व बुलंद मर्तबा अता फरमाएगा। अल्लाह रब्बुल आलमीन रोज़े महशर हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) को मक़ाम-ए-मेहमूद, लीवॉल हम्द और हौज़े कौसर अता फरमाएगा। जब नफ्सि नफ्सि का आलम होगा। जहां कोई किसीके काम न आएगा। मेरे आक़ा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) हम गुनाहगारो की शफ़ाअत करेंगे और बक्शीश कराएँगे। आज कुछ बाद अक़ीदा जमाअत के लोग शफ़ाअत-ए-मुस्तफा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) का इनकार करते है। मअज़ल्लाह। सुम्मा मअज़ल्लाह अस्तग़्फ़िरुल्लाह। तरह तरह की गुस्ताखियाँ करते है।

अहले ख़बीसो गैर मुक़ल्लिद का ये कहना है के मअज़ल्लाह सुम्मा मअज़ल्लाह अस्तग़्फ़िरुल्लाह नौज़बिल्लाह मिन ज़ालिक़ कि नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) अपनी बेटी फातिमा ज़हरा (रज़िअल्लाहो अन्हा) को भी नहीं बचा सकते। आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) ने अपनी बेटी फातिमा (रदिअल्लहु अन्हु) से फ़रमाया ऐ मेरी बेटी अमल कर। अगर रोज़-ए-महशर पकड़ हुई तो में नहीं बचा सकता। मअज़ल्लाह सुम्मा मअज़ल्लाह अस्तग़्फ़िरुल्लाह नौज़बिल्लाह मिन ज़ालिक़। ये जाहिल अकल के पैदल नस्ल के गंदे अब्दुल वहाब नजदी कि नाजाइज़ औलाद को क्या ये नहीं मालूम की बीबी हज़रते फातिमा ज़हरा (रज़िअल्लाहु अन्हा) का वो मर्तबा है के अल्लाह तआला ने आपको जन्नती औरतो कि सरदार यानी खातून-ए-जन्नत बनाया। दुनिया में ही आपको ये मर्तबा व मुक़ाम अता किया। और हदीस-ए-पाक के अल्फ़ाज़ कुछ इस तरह है।


हदीस न०: 1

एक रिवायत में जिसमे हज़रात फातिमा ख़ातूने जन्नत (रज़िअल्लाहो अन्हा) ने बयान किया उमूल मोमिनीन आयेशा सिद्दीका (रज़िअल्लाहो अन्हा) से वो ये है। हज़रात फातिमा (रज़िअल्लाहो अन्हा) फरमाती हैं जब पहली बार नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने सरगोशी की तो मुझे ये खबर दी के हर सार जिब्राइल मुझ से एक बार क़ुरआन पाक का दौर किया करते थे इस मर्तबा उन्होंने 02 बार दौर किया है, अब मेरा ये गुमान है की मेरा वक्त करीब आगया है। तुम अल्लाह से डरना और सब्र करना। बेशक मैं तुम्हारा अच्छा पेशवा हूँ। ख़ातूने जन्नत फातिमा (रज़िअल्लाहु अन्हा) ने कहा :

“ये सुन कर मैं रोने लगी जब नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहो अलैहि वस्सलाम) ने मुझे गिरया करते देखा तो दोबारा।”

मुझसे सरगोशी की और फ़रमाया, “ऐ फातिमा! क्या तुम इस बात से राज़ी नहीं हो के तुम तमाम जन्नतियों की बीवियों की या तमाम मोमिनो की बीवियों की सरदार हो। खातून-ए-जन्नत ने फ़रमाया फिर मुझे हसी आ गयी।”

(सहीह बुखारी, Vol : 02, Page : 920, Book No 61, किताबुल मनाक़िब-ए-नबी व अशबन नबी, बाब : अलामत अलनबूवत फील इस्लामी, हदीस : 3623, 3624)

(खतीब बगदादी अल मिश्कत Al मासबीह, Vol : 02, Page : 435, किताबुल मनाक़िब, बाब : मनाक़िब-ए-अहले बैत ए नबी, हदीस : 6138)

यहाँ हदीस-ए-पाक के अल्फ़ाज़ ज़रा गौर से पढ़ले। यहाँ बीबी फातिमा ज़हरा (रज़िअल्लाहु अन्हा) की राजा को अहमियत दी गयी है। आपसे पूछा जा रहा है के क्या आप इससे राज़ी है या इसमें इज़ाफ़ा किया जाये? गोया के अल्लाह तआला और उसके हबीब (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) बीबी फातिमा ज़हरा (रज़िअल्लाहु अन्हा) की राजा पूछ रहे हैं क्या आप इससे राज़ी हैं या और इज़ाफ़ा किया जाये। ये मुक़ाम है सय्यदा बीबी फातिमा ज़हरा (रज़िअल्लाहु अन्हा) का। अल्लाह तआला ने आपके चाहनेवालो को भी जन्नत की बशारत दी है। अब जो अवाम को गुमराह करने की साज़िशे करता हो ऐसे मरदूदों पर अल्लाह रब्बुल आलमीन की बेशुमार लानत हो।

खातून-ए-जन्नत सय्यदा बीबी फातिमा ज़हरा (रज़िअल्लाहु अन्हा) की फ़ज़ीलते हदीस की रौशनी में यहाँ ज़रूर पढ़े।

जो नबी-ए-करीम रउफ-ओ-रहीम रेहमताललील आलमीन शफी-ए-महशर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) को बे इख़्तेयार व मज़बूर माने बेशक वो आपका गुस्ताख़ है। और ऐसे ख़बीसो के नापाक अक़ाइद के रद्द में ये पोस्ट लिख रहा हूँ। मेरे आक़ा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) को अल्लाह तआला ने वो शान अता की है जिसे रोज़-ए-महशर पूरी क़ायनात, तमाम मख्लूक़, तमाम अम्बिया अलैहिस्सलाम देखेंगी।

लोग किस मुंह से हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) की बारगाह में जायेंगे। जिनका कलमा पढ़ते हैं उन्हिकि शानो शौकत का इनकार करते हैं। यहाँ शफ़ाअत-ए-मुस्तफा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) को क़ुरआन व हदीस की रौशनी में साबित किया गया है। शफी-ए-महशर, रेहमते आलम, इमामुल अम्बिया, खातमुन नबीय्यीन, हबीबे खुदा मुहम्मद मुस्तफा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) रोज़े महशर शफ़ाअत फरमायेंगे:

मुजद्दिदे दिनों मिल्लत इश्क़ो मोहब्बत सर्कार इमाम अहमद राजा खान आलाहज़रत रहमतुल्लाह अलैहि क्या खूब फरमाते हैं,

“जिसके माथे शफ़ाअत का सेहरा रहा
उस जबीने सआदत पे लाखों सलाम”

“जबकि हो हर तरफ नफ्सि, नफ्सि का शोर,
जब किसी का किसी पैर न चलता हो ज़ोर,
काश महशर में जब उनकी आमद हो और
भेजें सब उनकी शौकत पे लाखों सलाम।”


हदीस न०: 2

हज़रात अनस (रज़िअल्लाहु अन्हो) से एक तवील रिवायत बयान फ़रमाई हुज़ूर नबी-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) ने इरशाद फ़रमाया,
जब क़यामत का दिन होगा तो लोग इखट्टा कर हज़रात आदम (अलैहिस्सलाम) के पास हाज़िर होंगे और अर्ज़ करेंगे के आप अपने रब की बारगाह में हमारी शफ़ाअत कीजिये, वह फरमायेंगे इसके लिए मैं नहीं, लेकिन तुम हज़रात इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) का दमन पकड़ो क्युकी वो अल्लाह के खलील हैं, तो वो हज़रात इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के पास जायँगे तो वो भी फरमायेंगे मैं इसके लिए नहीं हूँ, लेकिन तुम सय्यदीना मूसा (अलैहिस्सलाम) के पास जाओ क्युकी वो अल्लाह के कलीम हैं वो फरमायेंगे मैं इसके लिए नहीं, लेकिन तुम हज़रात ईसा (अलैहिस्सलाम) की बारगाह में जाओ क्युकी वो रूहुल्लाह है वो भी फरमायेंगे मैं इसलिए नहीं हूँ, लेकिन तुम हज़रात सय्यदीना मुहम्मद मुस्तफा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) की बारगाह में चले जाओ, वह मेरे पास आएंगे मैं फ़रमाऊँगा, “मैं ही तो शफ़ाअत करने के लिए हूँ” फिर मैं अल्लाह तआला से इज़ाज़त तलब करूँगा तो मुझे इज़ाज़त मिलेगी और अल्लाह ताला मेरे क्लब में ऐसी हम्द डालेगा के जो मेरे इल्म में हाज़िर नहीं,

मैं उन हम्दो से हम्द करूँगा और अल्लाह के हुज़ूर सजदे में गिर जाऊंगा, कहा जायेगा “आएकी जायगी” मैं अर्ज़ करूँगा

या रब मेरी उम्मत मेरी उम्मत”

तो फ़रमाया जायगा जाइये और अपनी उम्मत के हर शख्स को जहन्नम से निकल लीजिये जिसके दिल में जाव के बराबर भी ईमान हो मैं जाऊंगा और उन्हें निकल लाऊंगा फिर वापस आऊंगा और उन्ही हम्दो से रब की हम्द करूँगा फिर दोबारा रब तआला के हुज़ूर सजदे में गिर जाऊंगा कहा जायेगा,

“ए मुहम्मद सर उठाइये कहिये आपकी सुनी जायगी मांगिये अता किया जायगा शफ़ाअत कीजिये कबूल की जायगी” मैं अर्ज़ करूँगा,

या रब मेरी उम्मत मेरी उम्मत”

तो फ़रमाया जायगा जाइये और अपनी उम्मत के हर शख्स को जहन्नम से निकल लीजिये जिसके दिल में राइ के दाने के बराबर भी ईमान हो मैं जाऊंगा और उन्हें निकल लाऊंगा, फिर वापस आऊंगा और उन्ही हम्दो से रब की हम्द करूँगा फिर दोबारा रब ताला के हुज़ूर सजदे में गिर जाऊंगा कहा जायेगा,

“ए मुहम्मद सर उठाइये कहिये आपकी सुनी जायगी मांगिये अता किया जायगा शफ़ाअत कीजिये कबूल की जायगी” मैं अर्ज़ करूँगा

या रब मेरी उम्मत मेरी उम्मत”

तो फ़रमाया जायगा जाइये और जिसके दिल में राइ के दाने से Bhi कमतर ईमान हो, उससे भी आग से निकल लीजिये, चुनाचे मैं जाऊंगा और ऐसा ही करूँगा”

(सहीह बुखारी, Vol :09, किताबत तौहीद, बाब : कलम अल-रब्बी यौम अल-कियामती, हदीस : 7510)
(सहीह मुस्लिम Vol : 01, Page : 307, किताबुल ईमान, बाब : ىندأ ُلهأ ُةنجلا ُةلزنم ﺎهيف, हदीस : 311)
(मिरातुल मानजीह सहारा-ए-मिश्कत अल-मासबीह Vol : 07, Page : 417)

फिर इसी तरह की रिवायत हज़रात अनस बिन मालिक (रदिअल्लहु अन्हु) के तुर्क से इमाम बुखारी रहमतुल्लाह अलैह ने अपनी सही में रिव्वायत की है।

(सही बुखारी Vol : 06, Page: 23, किताबत तफ़्सीर, हदीस : 4476)
(सही बुखारी Vol : 08, Page: 302, किताब अर-रिकार बाब : जन्नत और जहन्नम के सिफ़ात, हदीस : 6565)
(सही बुखारी Vol : 09, Page: 304, 325, किताबत तौहीद हदीस : 7410, 7440)

इस रिवायतों में लोगों का हज़रात नूह (अलैहसलाम) के पास जाने का भी ज़िक्र है।
फिर हज़रात नूह उन्हें हज़रात इब्राहीम के पास भेजेंगे।
हज़रात अबू हरैरा (रज़िअल्लाहु अन्हु) से भी इस तरह की रिवायत मरवी है।

(सही बुखारी Vol : 06, Page : 188, किताबुन तफ़्सीर, हदीस : 4712)
(सही बुखारी Vol : 04, Page : 341, किताबुन नबी, हदीस : 3361)
(सही मुस्लिम Vol : 01, Page : 323, किताबुल ईमान, हदीस : 194)
(सुनन तिर्मिज़ी Vol 04, Page : 442, किताब शफात-ए-क़यामत अर-रिराक वाल वारा रसूल अल्लाह, हदीस : 2434)
(इमाम नववि रीयदुसालहीन, हदीस : 1866)

हज़रात अबू सईद खुदरी (रज़िअल्लाहु अन्हु) से मरवी भी रिवायत जिसको इमाम मुस्लिम ने अपनी सही में रिवायत किया है।
“सभी रसूल ने कहा इज़ हबु इला गैरी,
आना लाहा का ये मुज़्दा सुनाने आये हैं,
रऊफ ऐसे है और ये रहीम है इतने,
के गिरते पड़ता को सीने लगाने आये है।”


हदीस न०: 3

हदीस-ए-मुबारक का मफ़हूम है के हज़रते सय्यदना इब्ने उम्र رضي الله تعالٰی عنه से रिवायत है की नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) ने फ़रमाया :
”जिस से हो सके की वह मदीना में मारे तोह वहीं पर मारे क्यूंकि जो मदीना में मरेगा उस की में शफ़ाअत करूँगा।”

(जामिआ तिर्मिज़ी : Eng ref. : Vol. 1, Book 46, हदीस 3917
Arabic ref. : Book 49, हदीस 4296)


हदीस न०: 4

हज़रात अउफ़ बिन मालिक अल-असहज (रज़िअल्लाहु अन्हु) से रिवायत है रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) ने फ़रमाया,
“मेरे रब की तरफ से एक आनेवाला फरिश्ता मेरे पास आया और कहा कि, “अल्लाह ने आपको दो चीज़ों के दरमियान इख़्तेयार दिया है की या तो आपकी आधी उम्मत को जन्नत में दाखिल कर दिया जाए या फिर आपको शफ़ाअत दे दी जाए तो मैंने शफ़ाअत को इख़्तेयार किया और ये उन सबके लिए होगी इस हाल में मर जाए की अल्लाह के साथ किसी को शरीक नहीं करता हो”

(जमाई तिर्मिज़ी Vol : 04, Page : 429-430, किताब शफ़ाअत-ए-क़यामत अर रिकाक वाल वारा रसूल अल्लाह ىلص ُالل ُهيلع ملسو, बाब न० 13, हदीस : 2441)
(सुनन इब्ने मजह Vol : 05, Page : 409, किताबुज ज़ुहद, बाब : ज़िक्र-ए-शाफ़ात, हदीस : 4317)
(इमाम हाकिम अल मुसतदरक Vol :01, Page : 135, हदीस : 221)
(इमाम टाबरानी अल मुअजम उल कबीर, Vol : 18, Page : 68, हदीस : 126)
(इमाम टाबरानी मुसनद-ुष-शामिययीन, Vol : 01, Page : 326, हदीस : 575)


हदीस न०: 5

हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़िअल्लाहु अन्हु) से रिवायत है की हुज़ूर नबी-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) ने फ़रमाया: “क़यामत के दिन सूरज लोगों के बहुत क़रीब आ जाएगा यहाँ तक की(उस की तपिश के बा’इस लोगों के) निस्फ़ कानों तक पसीना पहुँच जाएगा लोग इस हालत में (पहले) हज़रात आदम (अलैहिस्सलाम) से मदद मांगने जाएंगे, फिर हज़रात मूसा (अलैहिस्सलाम) से, फिर आखिर में (हर एक के इंकार पर) हज़रात मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) से मदद मांगेंगे।”

(सही बुखारी Vol : 02, Page : 323, किताबुज ज़कात, हदीस : 1475)
(इमाम बैहक़ी शोएबल ईमान Vol : 03, Page : 269, हदीस : 3509)
(इमाम तबरानी मुअजम उल अवसात Vol : 02, Page : 854, हदीस : 884)
(इमाम देलमी अल मुसनद उल फिरदौस Vol : 02, Page : 377, हदीस : 3677)


हदीस न०: 6

हज़रात इब्ने उमर (रज़िअल्लाहो अन्हो) फरमाते हैं क़यामत के दिन लोग अपने घुटने के बल होंगे और हर उम्मत अपने अम्बिया की पैरवी करेगी और कहेगी ए फला ए फला अल्लाह ताला से हमारी सिफारिश फ़रमादें, यहाँ तक के शफ़ाअत हुज़ूर नबी-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) को अता की जायगी और वो दिन अल्लाह तआला हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) को मक़ाम अल महमूद अता करेगा”

(सही बुखारी Vol :06, Page :195, किताबतफ़सीर, हदीस : 4718)


हदीस न०: 7

हदीस-ए-मुबारक का मफ़हूम है के हज़रते सय्यदना इब्ने उमर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) से रिवायत है की नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) ने फ़रमाया:

“तुम में से जो यह कर सके की वह मदीने में आ कर मरे तो वह ऐसा ज़रूर करे इसलिए की में मदीने में मरने वाले के हक़ में गवाही दूंगा।”

(सुनन इब्ने मजह : Eng ref. : Vol. 4, Book 25, हदीस 3112
Arabic ref. : Book 25, हदीस 3231)


हदीस न०: 8

हज़रात अबू सईद खुदरी (रज़िअल्लाहो अन्हो) से रिवायत है रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) ने फ़रमाया,

“मई रोज़े-ए-क़यामत तमाम औलाद-ए-आदम का सरदार रहूँगा और मुझे इस्पे फक्र नहीं,

अल्लाह की हम्द का झंडा मेरे दस्त-ए-करम में होगा और मुझे इस्पे फक्र नहीं,
क़यामत के दिन सारे अम्बिया ख़्वाह आदम सब मेरे झंडे (लीवॉल हम्द) के साये होंगे, सबसे पहले जमीन मेरे लिए खोली जायगी और मैं इस्पे कोई फक्र नहीं करता”

(जमाई तिर्मिज़ी Vol : 06, Page : 315, किताब अल मनाक़िब, हदीस : 3615)

सुब्हानअल्लाह इस हदीस-ए-पाक में शफी-ए-महशर, रेहमते आलम, खातमुन नबीय्यीन (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) के शानो शौकत का बेहतरीन बयान है।
इश्क़ो मोहब्बत सरकार इमाम अहमद राजा खान फ़ाज़िले बरेलवी आलाहज़रत रहमतुल्लाह अलैहि फरमाते हैं,

“सबा वो चले के बाघ पहले
वो फूल खिले के दिन हों भले
लिवा के टेल सना में खुले
राजा की ज़बान तुम्हारे लिए।”

डॉ. अल्लामा मुहम्मद इक़बाल क्या खूब फरमाते हैं
“फ़क़त इतना सबब है इनकादे बज़्मे महशर का,
के उनकी शान-ए-मेह्बूबी दिखाई जानेवाली है”


हदीस न०: 9

हदीस-ए-मुबारक का मफ़हूम है के हज़रते सय्यदना अबू हुरैरह رضي الله تعالٰی عنه से रिवायत है
की नबी-ए-करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम (ﷺ) ने फ़रमाया
”जो शख्स मदीने की भूख और सख्ती बर्दाश्त करेगा
क़यामत के दिन में उस का शाफ़ेई या गवाह बनूँगा।”

(जामिआ तिर्मिज़ी : Eng ref. Vol. 1, Book 46, हदीस 3824 Arabic ref. : Book 49, हदीस 4303)


हदीस न०: 10

“हज़रात अबू हरैरा रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है नबी-ए-अकरम ىلص ِالل ِهيلع ملسو से इस आयत,
“करीब है की तुम्हारा रब ऐसी जगह खड़ा करे जहाँ सब तुम्हारी हम्द करें”

(सौराह बनी इजराइल/इसरा- आयात 79) के बारे में पूछा गया तो इरशाद फ़रमाया, शफ़ाअत”
(जमाई तिर्मिज़ी Vol :05, Pg : 442, किताबत तफ़्सीर, बाब : वामा सूरह बनी इसराइल, हदीस 3137)
इमाम तिर्मिज़ी फरमाते है ये हदीस हसन है।


हदीस न०: 11

बुखारी शरीफ में है के हज़रते ज़ैद बिन असलम رضي الله تعالٰی عنه ने अपने वालिद से सुना की हज़रात उमर رضي الله تعالٰی عنه ये कहा करते थे

“या अल्लाह मुझे तेरे रास्ते में शहादत नसीब फरमा और तेरे रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) के शहर (मदीना) में मौत नसीब फरमा।”

(सहीह बुखारी : हदीस 1890
Book ref. : 29, हदीस 24 Eng ref. : Vol 3, Book 30, हदीस 114)

हज़रते उमर رضي الله تعالٰی عنه की दुआ क़ुबूल हो गयी:

अमीरुल मोमिनीन हज़रते सय्यदना अबू बक्र सिद्दीक़ رضي الله تعالٰی عنه ने अपने बाद हज़रते उमर رضي الله تعالٰی عنه को खलीफा मुन्तख़ब फ़रमाया और 10 बरस 6 माह 4 दिन आप رضي الله تعالٰی عنه ने तख़्त-ए-खिलाफत पर रौनक अफ़रोज़ हो कर जा नशीनी-ए-रसूल की तमाम ज़िम्मेदारियों का बा हुस्न-ए-वुजूह अंजाम दिया।

26 ज़ुल हिज्जः 23 हिजरी को नमाज़-ए-फज्र में अबू लूलू फ़िरोज़ मजूसी काफिर ने आप رضي الله تعالٰی عنه को शिकम में खंजर मारा और आप यह ज़ख्म खा कर शरफ़-ए-शहादत से सरफ़राज़ हो गए। बा वक़्ते वफ़ात आप رضي الله تعالٰی عنه की उम्र शरीफ 63 बरस की थी।
हज़रते सुहैब رضي الله تعالٰی عنه ने आप की नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ाई और रोज़ा-ए-मुबारक के अंदर हज़रते सिद्दीक़-ए-अकबर के पहलु-ए-अनवर में मद्फूं हुवे।

(अल कमाल फि अस्मा उल रिजाल, हर्फ़ उल अयन, फसल फि असहाबत, सफ़्हा 602)
(करामाते सहाबा رَضَیِ اللہُ تَعَالٰی عَنْھُم (Hindi) मक्तबतुल मदीना-Hind, सफ़्हा 73)


हदीस न०: 12

हज़रात अबू हरैरा (रज़िअल्लाहो अन्हो) से रिवायत है नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) ने इरशाद फ़रमाया,
“सबसे पहले ज़मीन मेरे लिए खुलेगी और मैं जन्नत से आये लिबास जेबतन करूँगा,
फिर मैं अर्श के सीधे जानिब खड़ा रहूँगा,
मखलूक में मेरे इलावा उस मक़ाम पे कोई नहीं रहेगा।”

(जमाई तिर्मिज़ी Vol : 06, Page : 312, किताब अल मनाक़िब, हदीस : 3611) इमाम तिर्मिज़ी फरमाते हैं ये हदीस हसन है।
(जमाई तिर्मिज़ी, हदीस : 3148) (सुनन अबू दाऊद हदीस : 4673)


हदीस न०: 13

यज़ीद अल फ़क़ीर कहते हैं मुझे खारजिअत के नज़रीअत पसंद आगये मैं खरजी होगया था। हम जमाअत की शक्ल में हज के लिए निकले फिर वह से लोगो को खारजिअत की तब्लीग करने चल पड़े। उन्होंने कहा हम मदीना से गुजरे और देखा हज़रात जाबिर बिन अब्दुल्लाह लोगो को मस्जिद-ए-नबवी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) में हदीस-ए-रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) का दरस दे रहे थे।

जब उन्होंने जहन्नम का ज़िक्र किया और कहा नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) चुल्लू भरेंगे और लोगो को जहन्नम से लेके जन्नत में ले जायँगे। (यानी शफ़ाअत-ए-रसूल का बयान) मैंने कहा ए सहाबी रसूल ये तुम क्या बयान कर रहे हो? जबकि क़ुरआन में अल्लाह फरमाता है,

“ए रब हमारे बेशक जिसे तू दोज़ख में ले जाए उसे जरूर तूने रुस्वाई दी और जालिमो का कोई मददगार नहीं”

(सूरह अल इमरान आयात 192)

फिर एक और आयत पढ़ी

“रहे वो जो बहुकम हैं उनका ठिकाना आग है, जब कभी उसमे (जहन्नम) से निकलना चाहेंगे फिर उसी में गिरा दिए जायँगे।”

(सूरह सजदाह आयात 20)

क़ुरआन ये कहता है और तुम क्या कहते हो? हम तुम्हारी माने या क़ुरआन को माने?
हज़रते जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़िअल्लाहो अन्हो) ने फ़रमाया,
इत्मीनान से पूछा क्या तुमने क़ुरआन पढ़ा है? यज़ीद अल फ़क़ीर कहते हैं हाँ हमने पढ़ी है क़ुरआन (बहोत जोश में आके कहा) जाबिर बिन अब्दुल्लाह ने फ़रमाया क्या तुमने उसमे मक़ाम-ए-मेहमूद के बारे में कुछ पढ़ा है?
“करीब है की तुम्हे तुम्हारा रब ऐसी जगह खड़ा करें जहाँ सब तुम्हारी हम्द करे”

(सूरह बनी इजराइल/इसरा आयात 79) यज़ीद अल फ़क़ीर कहते हैं, है हमने पढ़ा है।

जाबिर बिन अब्दुल्लाह फरमाते हैं पढ़ा है तो बस ऐसे ही पढ़ा है। आगे फरमाते हैं।
मक़ाम-ए-मेहमूद वो मक़ाम है जो अल्लाह ने अपने मेहबूब (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) को अता की या है जिसको चाहेंगे जहन्नम से आज़ाद करा देंगे।

फिर उसके बाद एक पुल (Bridge) का ज़िर्क किया जिसके ऊपर से लोग गुज़रेंगे और कहा मुझे और ज़्यादा याद नहीं लेकिन इतना मेरे जहँ में है लोग जहन्नम से निकले जाएन्गे और कहा इस तरह स्याह (Kaale) होंगे (यानी जहन्नम की आग से जलके)। फिर उन्हें जन्नत की नहर में डाला जायगा वह से जब निकलेंगे बिलकुल सफ़ेद कागज़ (White Paper) की तरह हो जायेंगे।

यज़ीद अल फ़कीर कहते हैं उनकी गुफ्तगू सुनने के बाद फिर हम वह से निकले और अपने उस्तादों के पास पहुंचे उन्होंने हमसे सबब पूछा लौटने का। सारा माज़रा बयान किया वो हम पे नाराज़ हुवे फिर मैंने कहा दिल नहीं मानता के ऐसे नूरानी चेहरे वाला सहाबी भी अल्लाह के रसूल के बारे में झूट बोल सकता है और हम सबने ख्वारीजत से तौबा कर्ली जो जो गए थे सिवाए एक के।

(सहीह मुस्लिम Vol : 01, Page : 313, किताबुल ईमान हदीस : 191, English : Book 01, हदीस : 381, 371)


हदीस न०: 14

“हज़रात अफ बिन मालिक अल असहज (रज़िअल्लाहु अन्हु) से रिवायत है रसूल अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) ने फ़रमाया तुम जानते हो रात मेरे रब ने मुझे क्या इख्तियार दिया है?
हम ने अर्ज़ किया : अल्लाह ताला और उस का रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) सब से बेहतर जानते हैं।
आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) ने फ़रमाया :
उस ने मुझे यह इख्तियार दिया है की अगर में चाहूँ तो मेरी निस्फ़ उम्मत को (बिला हिसाब-ओ-किताब) जन्नत में दाखिल कर दिया जाए या यह की में शफ़ाअत करून, मैंने शफ़ाअत को पसंद किया सहाबा (रिद्वानुल्लाही तआला अलैहिम अज’माईन) ने अर्ज़ किया :
या रसूलल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) !
अल्लाह तआला से हमारे लिए दुआ फरमाएं की अल्लाह तआला हमें (भी) शफ़ाअत के हक़ुएदरों में (शामिल कर दे)
आप (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) ने फ़रमाया :
वो हर मुस्लमान के लिए है।”

(सुनन इब्ने मजह Vol : 05, Page : 409, किताबुज ज़ुहद, बाब : ज़िक्र ए सहाफत, हदीस : 4317)
(इमाम हाकिम अल मुसतदरक Vol :01, Page : 135, हदीस : 221)
(इमाम तबरानी अल मुअजम उल कबीर, Vol : 18, Page : 68, हदीस : 126)
(इमाम तबरानी मुसनद-उस-शामिययीन, Vol : 01, Page : 326, हदीस :575)


हदीस न०: 15

अबू हरैरा (रज़िअल्लाहु अन्हु) से रिवायत है हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) ने फ़रमाया
हर नबी के लिए एक दुआ ऐसी होती है जो बहोत खास होती है,
जिसको खुदा वंड तआला कबूल फरमाता है और मैं अपनी ये दुआ को क़यामत के दिन के लिए मेहफ़ूज़ राखी है जिस से के अपनी उम्मत की शफात करूँगा”

(सहीह बुखारी Vol:08, Page: 178, कितबुत दुवात, बाब 01 :हर नबी की एक ऐसी दुआ जो अल्लाह तआला रद्द नहीं फरमाता, हदीस : 6304)
(सही मुस्लिम Vol :01, Page : 331, हदीस: 487)
(सहीह बुखारी Vol :08, Page :178, कितबुत दुवात, बाब 01 :हर नबी की एक ऐसी दुआ जो अल्लाह तआला रद्द नहीं फरमाता, हदीस : 6305 रिवायत हज़रात अनस इब्ने मलिक)


हदीस न०: 16

हज़रात इब्ने उम्र (रज़िअल्लाहो अन्हो) फरमाते हैं क़यामत के दिन लोग अपने घुटने के बल होंगे
और हर उम्मत अपने अम्बिया की पैरवी करेगी और कहेगी ए फला ए फला अल्लाह तआला से हमारी सिफारिश फ़रमादें,
यहाँ तक के शफात हुज़ूर नबी ए अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) को अता की जायगी
और वो दिन अल्लाह तआला हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) को मक़ाम अल महमूद अता करेगा”

(सहीह बुखारी Vol :06, Page :195, कितबुत तफ़्सीर, हदीस : 4718)


हदीस न०: 17

हज़रात जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह (रज़िअल्लाहु अन्हु) से रिवायत है नबी-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) ने फ़रमाया जो शख्स अज़ान के बाद ये दुआ कहे।

اللَّهُمَّ رَبَّ هَذِهِ الدَّعْوَةِ التَّامَّةِ وَالصَّلاَةِ الْقَائِمَةِ آتِ مُحَمَّدًا الْوَسِيلَةَ وَالْفَضِيلَةَ وَابْعَثْهُ مَقَامًا مَحْمُودًا الَّذِي وَعَدْتَهُ، حَلَّتْ لَهُ شَفَاعَتِي يَوْمَ الْقِيَامَةِ

ऐ अल्लाह इस दावत ए ता’म्मा और सलत ए का’ईमा के मलिक तू हमारे सरदार हज़रात मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) को वसीला और फ़ज़ीलत और बहोत बुलंद दर्जा अता फरमा और उनको मक़ाम-ए-मेहमूद में खड़ा फरमा जिसका तूने उनसे वादा फ़रमाया है,
उस शख्स को बरोज़ ए क़यामत मेरी शफ़ाअत मिलेगी”

(सही बुखारी Vol :01, Page :318, कितबुत अज़ान बाब : अज़ान के बाद दुआ का बयान हदीस : 614)
(सही बुखारी Vol :06, Page :194, कितबुत तफ़्सीर, हदीस : 4719)
(सुनन नासै Vol :01, Page : 400, किताबुल अज़ान हदीस : 681)
(सुनन अबू दाऊद Vol :01, Page : 330, किताबुस सलत बाब : अज़ान के बाद दुआ का बयान, हदीस : 529)
(जमाई तिर्मिज़ी Vol :01, Page :236, किताबुस सलात, हदीस : 211)
(सुनन इब्ने मजह Vol : 01, Page :477, किताबुल अज़ान व सुन्नति, बाब : मु’अज़्ज़िन के अज़ान पुकारने पे क्या कहे, हदीस : 722 )
(इमाम नववि रीयदुसालहीन, किताबुल फ़ज़ाइल, हदीस : 1039)


हदीस न०: 18

हज़रात अबू मूसा अशअरी (रज़ियल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है की हुज़ूर नबी ए अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) ने फ़रमाया:
मुझे यह इख्तियार दिया गया है ख़्वाह में क़यामत के दिन शफ़ाअत को चुन लून या मेरी आधी उम्मत को (बिना हिसाब किताब) जन्नत में दाखिल कर दिया जाए

तो मैंने उस में से शफ़ाअत को इख्तियार किया है क्यों की आम और (पूरी उम्मत के लिए) काफी होगी और तुम शायद यह ख्याल करों की वो परहेज़गारों के लिए होगी?
नहीं. बल्कि वो (मेरी शफ़ाअत) बहुत ज़्यादा गुनहगारों, खटकारों और बुराइयों में मुब्तिला होने वालों के लिए होगी।”

(सुनन इब्ने मजह Vol : 05, Page : 404, किताबुज ज़ुहद, बाब : ज़िक ए शफ़ाअत, हदीस : 4311)
(इमाम अहमद इब्ने हम्बल अल मुसनद Vol : 02, Page : 75, हदीस : 5452)
(इमाम बैहक़ी किताब अल ऐतेक़ाद Vol : 01, Page : 202)
(इमाम हेथमि मज़मा उज़ जावेद Vol : 10, Page : 378)


हदीस न०: 19

हज़रात अनस (रज़िअल्लाहु अन्हु) से रिवायत है की हुज़ूर नबी-ए-अकरम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) ने फ़रमाया:
मेरी शफ़ाअत मेरी उम्मत के उन अफ़राद के लिए है जिनोह्णे कबीरा गुनाह किये”

(सुनन अबू दाऊद Vol : 05, Page :233, किताब उल सुन्नत, बाब : फि शफ़ाअत, हदीस : 4739)
(जमाई तिर्मिज़ी Vol : 04, Page : 446, किताब सिफ़ात अल कियामती, हदीस : 2435)
(सुनन इब्ने मजह Vol : 05, Page : 404, किताबुज ज़ुहद, बाब : ज़िक्र ए शफ़ाअत, हदीस : 4311)
(इमाम हाकिम अल मुसतदरक Vol : 01, Page : 139, हदीस : 228)

وقال الحاكم : هذا حديث صحيح على شرط الشيخين

(इमाम अबू याला अल मुसनद Vol : 06, Page : 40, हदीस : 3284)
(इमाम टाबरानी अल मुअजम उस सगीर Vol : 01, Page : 272, हदीस : 448)


हदीस न०: 20

अबू हरैरा (रज़िअल्लाहु अन्हु) से रिवायत है हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) ने फ़रमाया
हर नबी के लिए एक दुआ ऐसी होती है जो बहोत खास होती है,
जिसको खुदा वन्द तआला कबूल फरमाता है और मैं अपनी ये दुआ को क़यामत के दिन के लिए मेहफ़ूज़ राखी है।
जिस से के अपनी उम्मत की शफ़ाअत करूँगा”

(सहीह बुखारी Vol :08, Page :178, कितबुत दुवात, बाब 01 :हर नबी की एक ऐसी दुआ जो अल्लाह तआला रद्द नहीं फरमाता, हदीस : 6304)
(सहीह मुस्लिम Vol :01, Page : 331, हदीस: 487)
(सहीह बुखारी Vol :08, Page :178, कितबुत दुवात, बाब 01 :हर नबी की एक ऐसी दुआ जो अल्लाह तआला रद्द नहीं फरमाता, हदीस : 6305 रिवायत हज़रात अनस इबने मलिक)


अल्लाह रब्बुल आलमीन क़ुरआन-ए-करीम में इरशाद फरमाता है

आयत न०: 1

“और रात के कुछ हिस्सों में तहज्जुद अदा करो यह खास तुम्हारे लिए ज़्यादा है, करीब है की तुम्हारा रब ऐसी जगह खड़ा करे जहाँ सब तुम्हारी हम्द करें”

(सूरह बनी इजराइल/इसरा – आयात 79)


आयत न०: 2

और अगर जब वह अपनी जनों पर ज़ुल्म करें,
तो ए मेहबूब! तुम्हारे हुज़ूर हाज़िर हों,
और फिर अल्लाह से माफ़ी चाहें, और रसूल उनकी शफ़ाअत फरमाए, तो ज़रूर अल्लाह को बहुत तौबा क़बूल करनेवाला मेहरबान पाएं।”

(सूरह अल निसा, आयत न०. 64)


आयत न०: 3

“लोग शफ़ाअत के मलिक नहीं मगर वही जिन्होंने रेहमान के पास करार रखा है”

(सूरह मरयम आयात 87)


आयत न०: 4

“उस दिन किसी की शफ़ाअत काम न देगी मगर जिसे रेहमान ने इज़ाज़त दे दिया है और उसकी बात पसंद फ़रमाई”

(सूरह तहा आयात 109)


आयत न०: 5

“और जब उनसे कहा जाता है की आओ अल्लाह के रसूल तुम्हारे लिए माफ़ी चाहे तो सर घूमते है और तुम उन्हें देखो की गौर करते हुवे मुँह फेर लेते है”

(सूरह मुनाफ़िक़ून, आयत 05)


आयत न०: 6

“लोग शफ़ाअत के मलिक नहीं मगर वही जिन्होंने रेहमान के पास करार रखा है”

(सूरह मरयम आयात 87)


आयत न०: 7

“उस दिन किसी की शफ़ाअत काम न देगी मगर जिसे रेहमान ने इज़ाज़त दे दिया है और उसकी बात पसंद फ़रमाई”

(सूरह तहा आयात 109)

इन आयत ए करीमा से मालूम हुआ के अल्लाह तआला अपने बन्दों को शफात का हक़ देगा के बरोज़े क़यामत दूसरे गुनाहगारो की शफ़ाअत करवाके उन्हें जन्नत ले जाए। अहले सुन्नत का अक़ीदा है हुज़ूर रेहमत ए आलम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) के इलावा औलिया, उलेमा, फुक़हा, हुफ़्फ़ाज़, हज़्ज़ाज़ वगैरा भी शफ़ाअत करेंगे अल्लाह तआला के इज़्न से।


आयत न०: 8

“और जब उनसे कहा जाता है की आओ अल्लाह के रसूल तुम्हारे लिए माफ़ी चाहे तो सर घूमते है
और तुम उन्हें देखो की गौर करते हुवे मुँह फेर लेते है”

(सूरह मुनाफ़िक़ून आयात 05)

ये आयात ए करीमा में अल्लाह तआला ने मुनाफिक़ीन की एक खासियत बताई के जब उनको कहा जाता है।
रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) की बारगाह में आओ के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) (ﷺ) तुम्हारे हक़ दुआ करे तो उल्टा पेअर होजाते हैं तो आज भी देखले के जिनको कहा जाए आओ क़ुरआन के फरमाने के मुताबिक।


आयत न०: 9

“और हमने कोई रसूल न भेजा मगर इसलिए के अल्लाह के हुकुम से उसकी इताअत की जाए
और अगर जब वो अपनी जानों पैर ज़ुल्म करे तोह ऐ मेहबूब तुम्हारे हुज़ूर हाज़िर हो और फिर अल्लाह से माफ़ी चाहे और रसूल उनकी शफ़ाअत फरमाए तोह ज़रूर अल्लाह को तौबा क़बूल करने वाला महेरबान पाए”

(सूरह निसा आयात 64)

रसूल अल्लाह की बारगाह में के अपने गुनाहो की माफ़ी मांगे के रसूल तुम्हारे हक़ दुआ करे तो आजके मुनाफ़िक़ भी उलटे पैर होजाते हैं तो क़ुरआन बता रहा है के हुज़ूर से भागनेवाले क़ुरआन की इस्तेलाह में मुनाफ़िक़ है आज भी देखलो आजके मुनाफ़िक़ कैसे भागते हैं जब कहा जाए आओ रसूल अल्लाह صلى الله عليه وسلم की बारगाह में तो चेहरे का रंग बदल जाता है।


शफ़ाअत किनकी नहीं होगी?

आयात न०: 10

وَلَقَد أوحِيَ إِلَيكَ وَإِلَى الَّذينَ مِن قَبلِكَ لَئِن أَشرَكتَ لَيَحبَطَنَّ عَمَلُكَ وَلَتَكونَنَّ مِنَ الخاسِرينَ
“अगर तुमने शिर्क किया तो ज़रूर तुम्हारे अमल बर्बाद होजायँगे और तुम नुक्सान उठाने वालों में से होजाओगे”

(सूरह अल ज़ूमर आयात 65)


मुनाफ़िक़ों के दलील शफ़ाअत की मुखालफत में:

आयत न०: 11

“और डरो उस दिन से की कोई जान दूसरे का बदला ना होगी और ना उसको कुछ लेकर चोदे और ना काफिर को कोई सिफारिश नफा दे और ना उनकी मदद हो”

(सूरह बक़रह आयात 123)


आयत न०: 12

“और इस क़ुरआन से उन्हें डराओ जिन्हे खौफ हो की अपने रब की तरफ यूँ उठाये जाए की अल्लाह के सिवा ना उनका कोई हिमायती हो न कोई सिफारिश इस उम्मीद पर की वो परहेज़गार हो जाएँ”

(सूरह अनाम आयात 51)

इस तरह की ही आयत जो शफ़ाअत के इंकार में नज़र आती है उन्हें आजके ख़वारिज मुसलमानो के आगे पढ़ते है और शफ़ाअत का इंकार करते है। दरअसल आयत सही कोटे की गयी पर माने गलत लिए गए इन जैसे तमाम आयात का ताल्लुक कुफ़्फ़ारो मुश्रिकीन से है। जो अपने बूथों के मुत्तालिक ये अक़ीदा रखते हुवे उनकी इबादत करते थे के उनके बूथ बरोज़े क़यामत अल्लाह तआला की बारगाह में इनकी शफ़ाअत करेंगे इनकी सिफारिश करेंगे जिसका ज़िक्र खुद क़ुरआन में रब तआला करता है।


आयत न०: 13

“अल्लाह के सिवा ऐसी चीज़ को पूजते है जो उनका भला ना करे और कहते है की ये अल्लाह के यहाँ हमारे सिफारिश हैं”

(सूरह यूनुस आयात 18)

तो पता चला के शिफारिश की उम्मीद से मुश्रिकीन अपने बूथों को पूजते थे और उनकी शफ़ाअत क़बूल न होगी। मुस्लमान सिर्फ अल्लाह तआला की इबादत करता है। उसके सिवा किसीको अपना माबूद नहीं मानता। किसीको अपना रब नहीं मानता। अब ये जाहिल मुनाफ़िक़ काफिरो पर नाज़िल हुई आयतो को ईमानवालो पर चिपका रहे है। जबकि क़ुरआन-ए-करीम से में अल्हम्दुलिल्लाह शफ़ाअत की दलील पेश कर चूका हु। अल्लाह तआला हमें इन ख़बीसो के फ़िटने से मेहफ़ूज़ रक्खे।
आमीन।
अव्वल आखिर दुरूद।


ज़रा ये भी पढ़ले:

अल्हम्दुलिल्लाह मैंने आपके सामने शफ़ाअत-ए-मुस्तफा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को हदीस व क़ुरआन-ए-करीम की रौशनी में बहवला साबित किया है। अब आप खुद सोचे की कौन हक़ पर है। वो जमाअत (अहके हगीज, डोभान्गी, तब्ली।गी, वहाबी और दीगर बातिल फ़िरक़े) जो हमेशा मेरे आक़ा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की शान व अज़मत को घटाने की नापाक कोशिश करते रहते हैं। या वो जमाअत जो दिन रात अपने आक़ा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की अज़मत व शानो शौकत को बयान करते है (अहले सुन्नत वाल जमाअत/मसलके आलाहज़रत) और आपके गुस्ताखो को मुंह तोड़ जवाब देते हैं। अल्लाह तआला से दुआ हैं के हमारी और हमारे आनेवाली नस्लों की इन बातिल बदमज़हबों के मैक्रो फरेब से हिफाज़त और हमे ईमान पर खत्म नसीब फरमाए। और रोज़-ए-महशर नबी-ए-करीम रउफ-ओ-रहीम शफी-ए-महशर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की शफ़ाअत हमें अता फरमाए।
आमीन।
अव्वल आखिर दुरूद।

आला हज़रात रहमतुल्लाह अलैह इसलिए फरमाते हैं
आज ले उनकी पनाह
आज मदद मांग उनसे,
फिर ना मानेगे
क़यामत में अगर मान गया।

“चुन चूंके करेंगे शफ़ाअत,
हर एक गुलाम का चेहरा हुज़ूर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जानते हैं।”

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