तावीज़ पेहेनना क़ुरान वा हदीस की रौशनी में

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Taweez pehenna Quran Wa Hadees KI Roshni me
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Taweez pehenna Quran Wa Hadees KI Roshni me

तावीज़ पेहेनना क़ुरान वा हदीस की रौशनी में

हम लोग तावीज़ और वजाइफ में क़ुरानी आयत ओ दुरूद शरीफ अहादीस में

वारिद मामूलात ओ वजाइफ बुज़ुर्गो से मन्क़ूल आमाल पढ़ कर दम करते हैं

या इन्हीं चीज़ो को लिख कर देते हैं और वहाबी गैर मुक़ल्लिद वगैरह

इन्हीं वजाइफ ओ तावीज़ात को जो क़ुरान हकीम ओ अहादीसे नबवियया में वारिद हैं

या बुज़ुर्गों से मन्क़ूल हैं उन वजाइफ वगैरह से बनाये हुए तावीज़ात को शिर्क कहते हैं

और बुखारी शरीफ की हदीस शरीफ पेश करते हैं जिस में यहूदी से दम करने का ज़िक्र है

सर्कार अक़दस صلی اللہ تعالی عليه وسلم कुफ्फार ओ मुश्रिकीन यहूदी नसरानी वगैरह के

ओह मंतर जिस में मज़मीं कुफरियया होते उस से मन फ़रमाया यानि

उन मंत्रो के मज़मीं में कभी ये होता कह वह लोग अपने माबूदान बातिल से इस्तिमदाद करते थे

यानि मदद मांगते थे मसलन ए लात मेरी परेशानी दूर कर दे ए उज़्ज़ा मेरी मुश्किल हॉल कर दे

(लात ओ उज़्ज़ा अरब के काफिरो के बूत थे) या कोई हिन्दुस्तानी काफिर इस तरह कहे

कह ए राम मेरी मदद करो ए सीता मेरा काम बना दे. ज़ाहिर है

कह इस तरह की ीाबरतें कुफरियया हैं इस लिए कह कुफ्फार ओ मुश्रिकीन इन बुतों को

अपना खुदा मान कर फिर उस से मदद मांगते हैं और बे शक ये कुफ्र है

सर्कार अक़दस صلی اللہ تعالی عليه وسلم ने कुफ्फार ओ मुश्रिकीन और

उनके माबूदाने बातिल बुतों की मज़म्मत ओ बुराई में जो कुछ फ़रमाया

उन्हें ये वहबियया हमारे खिलाफ बतौर दलील पेश कर के हम पर कुफ्र ओ शिर्क का हुक्म लगाते हैं

अगर तावीज़ ओ वजाइफ में क़ुरानी आयात हों या अहादीस में मन्क़ूल दुआ वगैरह हों

उन्हें पढ़ कर डैम करना या उन्हें लिख कर बतौर तावीज़ देना क़ुरान ओ हदीस से साबित है

अल्लाह रब्बुल आलमीन क़ुरआने करीम में फरमाता हैं

और हम क़ुरान उतारते है वो चीज़ जो ईमानवालो के लिए शिफा और रहमत है

और इस ज़ालिमों को नुकसान ही बढ़ता है

सूरह बानी इजराइल, पारा 15, रुकू 9, आयत 82, तर्ज़ुमा कंज़ुल ईमान)

अल्लाह تعالى ने क़ुरान शरीफ नाज़िल फ़रमाया और इस में मोमिनीन के लिए शिफा है

और जो मोमिन नहीं उन के लिए शिफा नहीं

इस आयत से साफ़ ज़ाहिर हो गया कह कौन मोमोइन है और कौन मोमिन नहीं

जो मोमिन है ओह क़ुरानी आयात से शिफा मानता है. और जो मोमिन नहीं ओह शिफा से इंकार करता है

अब यहाँ से आप हज़रात समझें कह कौन सी जमात रहे हक़ पर गामज़न है और कौन सी बातिल पर

इस सिलसिले में कुछ हदीस भी मुलाहज़ा करें

हदीस

हज़रात उम्मे सलमा (रदियल्लाहु तआला अन्हा) से रिवायत है

की रसूल अल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उनके घर में एक लोंदी को देखा

जिसका चेहरा ज़र्द था. हुज़ूर ने फ़रमाया इसे तावीज़ कराओ इसे नज़रे बाद लगी है

(मुस्लिम, बुखारी भाग-2 सफ़ा-854)
(मिश्कत सफ़ा-388)

हदीस

हजरत आयेशा (रदियल्लाहु तआला अन्हा) से रिवायत हे

की रसूल अल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) ने हुक्म फ़रमाया के

नज़र बाद के लिए दुआ तावीज़ कराये

(मुस्लिम,बुखारी भाग-2 सफ़ा-854 मिश्कत सफ़ा-388)

हदीस

हजरत अयफ बिन मालिक अशजाये (रदियल्लाहु तआला अन्हु)

ने फ़रमाया के हम लोग ज़माना-ए-जाहलियत में झाड़ फूंक करते थे

इस्लाम लेन के बाद हम ने अर्ज़ किआ

या रसूल अल्लाह इन मंतरों

के बारे में आप क्या फरमाते है

रसूल अल्लाह (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया

अपने मंतर मुझे सुनाओ उन मंतरों में कोई हर्ज नहीं जबतक के उनमे शिर्क न हो

(मुस्लिम,भाग-2 सफ़ा-224 मिश्कत सफ़ा-388)

हज़रात शेख अब्दुल हक़

मुहद्दिस दहेलवी रहमतुल्लाह अलेह इस हदीस के तहत फरमाते है

यानि मंतर में जिन व शयातीन

के नाम न हों और उस मंतर

के माना से कुफ्र लाज़िम न आता हो

तो उसके पढ़ने में कोई हर्ज नहीं और इसीलिए उलमा-ए-सेल्फ ने फ़रमाया हे

जिस मंतर का माना मालूम न हो उसे नहीं पढ़ सकते लेकिन जो

हुज़ूर अलैहिस्सलाम से सही तौर पर मन्क़ूल हो उसे पढ़ सकते हैं, अगर के उसका माना मालूम न हो.

(अशातुल लम्हात भाग-3 सफ़ा-604/अनवारुल हदीस)

रह गयी बात तावीज़ गले में लटकने की तो ये भी हदीस शरीफ से साबित है

हदीस

हदीस-ए-नबवी

सनद :

इमाम अबू दाऊद रहमतुल्लाह अलैहि

— > मूसा बिन इस्माइल रहमतुल्लाह अलैहि

— > हम्माद रहमतुल्लाह अलैहि

— > मुहम्मद बिन इशक़ रहमतुल्लाह अलैहि .

— > अम्र बिन शोएब रहमतुल्लाह अलैहि

— > अपने वाली रहमतुल्लाह अलैहि

— > अब्दुल्लाह इब्न अम्र रदिअल्लहु अन्हु

— (रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)

मटन :

हजरत अब्दुल्लाह इब्न अम्र रदिअल्लहु अन्हु बयान करते है

के (रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)ने फ़रमाया:

जब तुम में से कोई नींद में डर जाता हो, तो वो (यह) कलिमात कहे

‎أَعُوذُ بِكَلِمَاتِ اللَّهِ التَّامَّاتِ مِنْ غَضَبِهِ وَعِقَابِهِ وَشَرِّ عِبَادِهِ، وَمِنْ هَمَزَاتِ الشَّيَاطِينِ وَأَنْ يَحْضُرُونِ
.
हजरत अब्दुल्लाह बिन अम्र रदिअल्लहु अन्हु अपने समझदार बच्चों को यह कलिमात सिखाते थे

और न-समझ बच्चों के गले में यह कलिमात लिख-कर लटका देते थे

(सुनाने अबू दाऊद, जिल्द 4, साफा 141, हदीस No 3893)

वहाबी लोग क़ुरानी आयात वगैरह की तावीज़ गले में लटकने को भी शिर्क कहते हैं

तो वहाबियों के मज़हब के हिसाब से वह सहाबी मुशरिक हुए कह नहीं?

अब यहाँ से समझ लीजिये कह जिस मज़हब के नज़दीक सहाबी तक मुशरिक

हो जाएँ वह आप को कहाँ और किस रास्ते पर ले जाना चाहते है.

जिस मज़हब में सहाबए किराम तक मुशरिक हो जाएँ यक़ीनन वह जहन्नम का ही रास्ता होगा

अल्लाह ﻋﺰﻭﺟﻞ आप पर फ़ज़ल फरमाए

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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3 COMMENTS

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