आसमानी किताबों के बारे में अक़ाइद

0
253
Aasmani Kitabo Ke Baare Mein Aqaid
asmani kitabein
Islamic Palace App

Aasmani Kitabo Ke Baare Mein Aqaid

आसमानी किताबों के बारे में अक़ाइद

हर मुकल्लफ़ (आक़िल, बालिग़, मुस्लमान) पर तमाम आसमानी किताबों पर ईमान लाना ज़रूरी है जो अल्लाह तआला ने अम्बिया-ए-किराम पर नाज़िल फ़रमाई, अलबत्ता उनके जो अहकाम हमारी शरीअत में मंसूख हो गए उन पर

अमल दुरुस्त नहीं मगर ईमान ज़रूरी है मसलन पिछली शरीअतों में बैतूल मुकद्दसक क़िब्ला था, इस पर ईमान लाना तो हमारे लिए ज़रूरी है मगर अमल यानी नमाज़ में बैतूल मुक़द्दस की तरफ मुँह करना जाएज़ नहीं, (ये हुक्म) मंसूख हो चूका

(خزائن العرفان، پ1، بقره، تحت الآیتہ4)

क़ुरआन करीम से पहले जो कुछ अल्लाह ताला की तरफ से उसके अम्बिया पर नाज़िल हुआ उन सब पर मुख़्तसरान ईमान लाना फ़र्ज़-ए-आएं है

(خزائن العرفان، پ1، بقرہ، تحت الآیتہ4)

जो किताबें अल्लाह तआला ने नाज़िल फ़रमाई और अपने रसूलो के पास बतरीक़-ए-वही भेजी बेशक व शुबहा सब हके व सिद्क़ और अल्लाह की तरफ से हैं

(خزائن العرفان، پ3، بقره، تحت الآیتہ285)

क़ुरआन शरीफ पर मुख़्तसरान यूँ ईमान रखना फ़र्ज़ है की इसका एक एक लफ्ज़ अल्लाह तआला की तरफ से है और बार हक है जबकि क़ुरआन का तफ़्सीलान इल्म हासिल करना फ़र्ज़-ए-किफ़ाया है

(صراط الجنان، ج1، ص68)

अल्लाह तआला ने बाज़ नबियो पर सहीफे और आसमानी किताबें उतरी जिनकी तादाद तक़रीबन 104 है और उन में से चार किताबें बहुत मशहूर हैं,

“तौरात” हज़रात मूसा अलैहिस्सलाम पर, “ज़बूर” हज़रात दावूद अलैहिस्सलाम पर, “इंजील” हज़रात ईसा अलैहिस्सलाम पर और “क़ुरआन” के सबसे अफ़ज़ल किताब है, सबसे अफ़ज़ल रसूल हुज़ूर पुर नूर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर

(بہار شریعت، حصہ1، علامہ مفتی امجد علی اعظمی)

क़ुरआन-ए-पाक तब्दीली से मेहफ़ूज़ है, चूँकि ये दीन हमेशा रहने वाला है लिहाज़ा क़ुरआन की हिफाज़त अल्लाह तआला ने अपने ज़िम्मे राखी जबकि अगली किताबों की हिफाज़त अल्लाह तआला ने उम्मत के सिपुर्द की थी और उनसे

इसका हिफ़्ज़ (तहफ़्फ़ुज़) न हो सका और कलाम-ए-इलाही जैसा उतरा था उनके हांथो में वैसा ही बाक़ी न रहा, बल्कि उनके शरीरो ने तो ये किया की उन में तब्दीलिया कर दी यानी अपनी ख्वाहिश के मुताबिक़ घटा बढ़ा दिया लिहाज़ा जब

कोई बात उनकी किताबों की हमारे सामने पेश हो तो अगर वो हमारी किताब (क़ुरआन) के मुताबिक़ है तो हम उसकी तस्दीक़ करेंगे और अगर मुखालिफ है तो यक़ीन जानेंगे की ये उनकी तब्दीलियों से है और अगर मुखालफत

मुआफ़ाक़ात कुछ मालूम नहीं तो हुक्म है कि हम उस बात की न तस्दीक़ करें न तकज़ीब (न सहीह जानें न ग़लत) बालक यूँ कहें के,

اٰمنتُ باللہ وملٰـــئکتہ وکتبہ ورسلہ

यानी, अल्लाह और उसके फिरिश्तो और उसकी किताबों और उसके रसूलो पर हमारा ईमान है

(بہار شریعت، حصہ1، علامہ مفتی امجد علی اعظمی)

जो ये कहे की क़ुरआन में के कुछ पारे या सूरतें या आयतें बल्कि एक हर्फ़ भी किसी ने काम कर दिया या बढ़ा दिया या बदल दिया क़तअन काफिर है

(بہار شریعت، حصہ1، علامہ مفتی امجد علی اعظمی)

Follow US

हमारा फेसबुक पेज लाइक करने के लिए यहाँ क्लिक करें…

अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

ISLAMIC PALACE को लाइक करने के लिए आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया। जिन्होंने लाइक नहीं किया तो वह इसी तरह की दीन और इस्लाम से जुड़ी हर अहम बातों से रूबरू होने के लिए हमारे इस पेज Islamic Palace  को ज़रूर लाइक करें, और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को शेयर के ज़रिये पहुंचाए। शुक्रिया

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.