मौत का एक डराने वाला मुशाहेदा

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Maut Ka Ek Darane Wala Musheda
Muhammad
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Maut Ka Ek Darane Wala Musheda

मौत का एक डराने वाला मुशाहेदा

हर एक जानदार के सर पर मौत खड़ी रहती है। जब वह किसी को लेना चाहती है तो देखने वालों के होश उड़ जाते है।

जब देखते है कि एक प्यारा लेटा हुआ है जिसके चाहने वाले चारों तरफ़ खड़े है।

कोई दवा पिलाता है, कोई शहद चटाता है। दवा और शहद इधर-उधर होकर बह जाता है।

चेहरा मुर्झा गया और ज़र्दी आ गयी। माथे पर पसीना आ रहा है। सीने में एक पीस डालने वाली चक्की चल रही है।

ठण्डे और लम्बे-लम्बे साँस ले रहा है। आँखें ऊपर को चढ़ती जा रही है और उनसे पानी बह रहा है।

हिचकियाँ आ रही है। चारों तरफ़ से कलिमा शरीफ़ पढ़ने की आवाज़ आने लगी और एक जुदा होने वाले प्यारे को कलिमा याद दिला रहे है।

कोई सराहने बैठा हुआ सूरा-ए-यासीन सुना रहा है कि इतने में दो-तीन हिचकियाँ लेकर और सबको रोता छोड़कर हमेशा के लिए दुनिया से चल देता है।

फिर हाथ-पाँव सीधे करके मुँह पर ढाटा बाँध दिया जाता है कि मुँह न खुल जाये और एक चादर उढ़ाकर रोते हुए अलग हो जाते है।

और अब अपने प्यारे को पोशाक पहनाने की और ख़ाक में मिलाने की तैयारी करते है।

बाज़ार से पोशाक का कपड़ा और कपड़ों में और सजदा करने के आज़ा पर खुशबू और काफ़ूर लगाने को ले आये और सब सामान-ए-जहेज़ तैयार हो गया।

अब दूल्हा या दुल्हन की रुखसती में शरीक होने वाले बाराती आने लगे

और एक मुसाफ़िर की ख़ानगी या दूल्हा-दुल्हन का डोला जाने को तैयार है और ताअल्लुक़ के मुवाफ़िक़ बाराती जमा हो गये।

कोई कहता क्या देर है? कोई कहता ज़रा ठहरो अभी चलते है। कोई कहता है जल्दी करो, देर केना सुन्नत के ख़िलाफ़ है।

जवाब मिलता है कि बस ग़ुस्ल की देर है और दूल्हा या दुल्हन को ग़ुस्ल देना शुरू कर दिया। पानी के सर्द और गर्म का पूरा ख्याल रखा गया है।

ग़ुस्ल के लिए एक टूटे से तख्ते पर लिटा दिया गया है। देखना भाई किसी जगह बदन को तकलीफ़ न हो, आहिस्ता आहिस्ता नहलाओ और नर्मी से हाथ फेरो।

जब ग़ुस्ल दे चुके तो उस मुसाफ़िर को कपड़े पहनाये जाते है। काफ़ूर लगाया जाता है। मर्द है तो तीन कपड़े पहने हुए लेता है।

जिस पर आँसुओं के मोती वारे जाते है। और एक खुदा से शर्माये हुए का घूँघट हटा-हटा के उसकी मुँह दिखाई हो रही है।

जो गरीब न मुँह से बोले और न हाथ-पाँव हिला सके, बस चुपचाप लेटा हुआ है की इतने में बाराती आये और डोला उठाकर चल दिये।

(बाग़े-जन्नत यानी ख़ुदाई बाग़, सफ़ा न० 288)

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