Al Qur’an: (Some Inspirational Aayats)

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Al Qur’an : (Some Inspirational Aayats)
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Al Qur’an : (Some Inspirational Aayats)

Al Quran : (Some Inspirational Aayats)

Allah, In The Name Of, The Most Affectionate, Most Merciful
Assalato Wasallaamo ‘Alaika Yaa Rasool Allah Sallallaho ‘Alaihi Wasallam
Wa ‘Alaa Aalika Wa As Haabika Yaa Noor Allah Sallallaho ‘Alaihi Wasallam


Al क़ुरआन:

तो क्या यह समझते हो की हम ने तुम्हे बेकार बनाया और तुम्हे हमारी तरफ फिरना नहीं।

(सूरह मोअमीनन:115)


वह जिसने मौत और ज़िन्दगी पैदा की के तुम्हारी जांच हो तुम में किसका काम ज़्यादा अच्छा है।

(सूरह मुल्क:2)


लोगों का हिसाब नज़दीक है और वह गफलत में मुँह फेरे है।

(सूरह अम्बिया पारा:17 आयत:1)


अल क़ुरआन क्या ये लोग ये ख्याल करते हैं के हम इनकी पोशीदा बातों और सरगोशियों को सुनते नहीं?
हाँ हाँ सब सुनते हैं और हमारे फ़रिश्ते इन के पास इन की सब बातें लिख लेते हैं।

(सूरह-ए-ज़ुख़रफ़ : आयत न०. 80)


तो क्या यह समझते हो की हम ने तुम्हे बेकार बनाया और तुम्हे हमारी तरफ फिरना नहीं।

(सूरह मोअमीनन :115)


वह जिसने मौत और ज़िन्दगी पैदा की के तुम्हारी जांच हो तुम में किसका काम ज़्यादा अच्छा है।

(सौराह मुल्क: 2)


और करीब है के कोई बात तुम्हे बुरी लगे और वह तुम्हारे हक़ में बेहतर हो, और करीब है के कोई बात तुम्हे पसंद आये और वो तुम्हारे हक़ में बुरी हो, और अल्लाह जनता है और तुम नहीं जानते।

(सौराह बक़रह (सूरह 2, पारा 2) : 216)


कह दो के खुदा और उस के रसूल का हुकुम मानो अगर न मानें तोह खुदा भी काफिरों को दोस्त नहीं रखता।

(सूरह-ए-अल इमरान : आयत 32)


लोगों का हिसाब नजदीक है और वह गफलत में मुँह फेरे हैं

(सूरह अम्बिया:1)


और उसकी निशानियों से है तुम्हारे लिए तुम्हारी ही जींस से जोड़े बनाये के उनसे आराम पाओ और तुम्हारे आपस में मोहब्बत और रेहमत राखी।
बेसक इसमें निशानियां है ध्यान करने वालों के लिए।

(सूरह रूम:21)


और जब आदमी को तकलीफ पहुँचती है हमें पुकारता है लेते और बैठे और खड़े, फिर जब हम उसकी तकलीफ दूर कर देते हैं चल देता है,
गोया कभी किसी तकलीफ के पहुँचने पर हमें पुकारा ही न था।

(सूरह यूनुस : आयत-12)


और अल्लाह की रेहमत से न-उम्मीद मत हो।
बेशक अल्लाह की रेहमत से वही लोग न उम्मीद होते हैं जो काफिर हैं।

(अल-क़ुरआन : यूसुफ़ : 87)


और खुदा तुम्हरा मददगार है तोह तुम पर कोई ग़ालिब नहीं आ सकता।
और अगर वह तुम्हें छोड़ दे तोह फिर कौन है के तुम्हारे मदद करे और मोमिनों को चाहिए के खुदा ही पर भरोसा रखें।

(सूरह-ए-अल इमरान : आयत न०. 160)


और याद करो जब तुम्हारे रब ने सुना दिया के अगर एहसान मानोगे तो में तुम्हे और दूंगा,
और न-सुकरी करो तो मेरा अज़ाब सख्त है।

(सौराह इब्राहिम : 7)


जन्नत की औरतों और हूरों की ख़ास खूबी ये है के वह निगाहें नीची रखने वाली हैं”

(सूरह-ए-रेहमान)


और अपनी जेब ओ ज़ीनत ज़ाहिर न करें सिवाए उस के जो अज़ख़ुद ज़ाहिर हो जाये

(सूरह-ए-नूर 31)


अगर तुम अल्लाह से डरने वाली हो तो बात में नरम अंदाज़ न इख़्तियार करो के दिल की खराबी में मुब्तला कोई शख्स लालच में पर जाये

(सूरह-ए-अहज़ाब : 32)


और हम ने इन्सान को अपने माँ-बाप के साथ हुसन ओ सुलूक करने का हुक्म दिया है,
इसकी माँ ने इसे तकलीफ उठा केर पेट में रखा और तकलीफ बर्दाश्त कर के इसे जना।

(अल अहकाफ : 15)


वो जिनसे लोगो ने कहा के लोगो ने तुम्हारे लिए जथ्था जोड़ा तो उनसे डरो,
तो उनका ईमान और ज़ैद हुआ, और बोले अल्लाह हमको बस है, और क्या अच्छा कारसाज़।

(Q-3:173)


ए ईमान वालों! सब्र और नमाज़ से मदद चाहो, बेसक अल्लाह सबीरों के साथ है।

(सूरह बक़रह : 153)


और मेरे बन्दों से फरमाओ वह बात कहे जो सब से अच्छी हो,
बेशक सैतान उनके आपस में फसाद दाल देता है।

(सूरह बानी इस्राईल : 53)


और ज़मीन में इतराता न चल, बेशक हरगिज़ ज़मीन को न चिर डालेगा और हरगिज़ बुलंदी में पहाड़ों को न पहुंचेगा।

(सूरह बानी इस्राईल : 37)


गंदियां (Dirty women) गंदों (Dirty men) के लिए और गंदे गांदियों के लिए और सुथरियाँ (Clean women) सुथरों (Clean men) के लिए और सुथरे सुथरियों के लिए।

(सूरह नूर (24) :26)


बदकार मर्द निकाह न करे मगर बदकार औरत या शिरकवाली से और बदकार औरत से निकाह न करे मगर बढ़कर मर्द या मुशरिक और ये काम ईमान वालों पर हराम है।

(सूरह नूर (24): 3)


और अगर जब वो अपनी जानों पर ज़ुल्म करे, तो ऐ मेहबूब तुम्हारे हुज़ूर हाज़िर हों
और फिर अल्लाह से माफ़ी चाहें और रसूल उनकी शफ़ाअत फरमाये
तो ज़रूर अल्लाह को बहुत तौबा काबुल करने वाला मेहरबान पायें।

(सूरह निसा Verse.64)


चसत की कसम और रात की जब पर्दा डले, के तुम्हे तुम्हारे रब ने न छोड़ा और न मकरूह जाना,
और बेशक पिछली तुम्हारे लिए पहली से बेहतर है, और बेशक करीब है के तुम्हारा रब तुम्हे इतना देगा के तुम राज़ी हो जाओगे,
क्या उसने तुम्हे यतीम न पाया फिर जगह दी, और तुम्हे अपनी मोहब्बत में खुद-रफ्ता पाया तो अपनी तरफ राह दी,
और तुम्हे हाजतमन्द पाया फिर गनी कर दिया,
तो यतीम पर दबाओ न डालो और मंगाता को न ज़िड़को और अपने रब की नेअमत का खूब चर्चा करो।

(सूरातुद दोहा)


ये नबी मुसलामानों का उनकी जान से ज़्यादा मालिक है और उनकी बीवियां (WIVES) उनकी माँ (MOTHERS) हैं।

(सूरह अहज़ाब : 6)


बेशक तुम्हारे पास तशरीफ़ लाये तुम में से वो रसूल जिन पर तुम्हारा मुसक्कत में पड़ना गिरन है तुम्हारी भलाई के निहायत चाहने वाले मुसलमानों पर कमल महेरबान महेरबान।
फिर अगर वह मुँह फेरे तो तुम फरमादो के मुझे अल्लाह काफी है, उसके शिव किसी की बंदगी नहीं। मैंने उसी पर भरोसा किया और वह बड़े अर्श का मालिक है।

(सूरह तौबाः : 128 129)


वो जो ‘अल्लाह’ और उसके ‘रसूलों’ को नहीं मानते और चाहते हैं के अल्लाह से उसके रसूलों को जुड़ा करदें और कहते हैं,
हम किसी पर ईमान लाये और किसी के मुनकिर हुए और चाहते हैं की ईमान व कुफ्र के बीच में कोई राह निकालें।
यही है ठीक-ठीक काफिर, और हमने काफिरों के लिए ज़िल्लत का अज़ाब तैयार कर रखा है।

(सूरह निशा (4) : 150, 151)


और ज़्यादा लेने की निय्यत से किसी पर एहसान न करो, और अपने रब के लिए सब्र किये रहो।

(सूरह मुदस्सिर (74) : 6-7)


ऐ ईमान वालों, क्यों कहते हो वह जो नहीं करते।
किसी सख्त न-पसंद है अल्लाह को वो बात के वो कहो जो न करो।

(सूरह सफक (61) : 2-3)


और हम किसी न किसी तरह तुम्हारी आज़माइश ज़रूर करेंगे दुश्मन के डर से भूख प्यास से जान-व-माल से।

(क़ुरआन 2:15)


और जो खुदा की राह में मारे जायें उन्हें मुर्दा न कहो बल्कि वो ज़िंदा हैं, हाँ तुम्हे खबर नहीं।

(सूरह बकरा, Verse : 154)


और अल्लाह अज़्ज़वजल को अपनी क़समों का निशाना न बना लो।

(पारा 2, सूरत अलबक़रा, आयत 224)


और जब उनके पास अल्लाह की वो किताब (क़ुरआन) आई जो उनके साथ वाली किताब (तौरेत) की तस्दीक फरमाती है,
और इस से पहले वो उसी नबी के वसीले से काफिरों पर फतह मांगते थे, तो जब तसरीफ लाया उनके पास वो जाना पहचाना उस से मुनकिर हो बैठे,
तो अल्लाह की लानत मुन्किरों पर

(सूरह बक़रह :89)


जिसने किसी इन्सान का क़त्ल किया,
गोया उसने तमाम इन्सानों का क़त्ल किया, जिसने किसी इन्सान की जान बचाई,
गोया उसने तमाम इन्सानों की जान बचाई।

(सूरह-ए-मैदा, आयत न० : 32)


जो तुम पर ज़ियादती करे उस पर ज़ियादती करो उतनी ही जितनी उसने की,
और अल्लाह से डरते रहो और जान रखो के अल्लाह डर वालों के साथ है

(सूरह बक़रह : 194)


ये आख़िरत का घर हम उनके लिए करते हैं जो ज़मीन में तकब्बुर नहीं चाहते और न फसाद, और आक़िबत परहेज़गारों ही की है।

(सूरह कसस : 83)


और ईमान वालों को खुस-खबरि दो के उनके लिए अल्लाह का बड़ा फ़ज़ल है।
और काफिरों और मुनाफ़िक़ों की खुसी न करो और उनकी इज़ा पर दरगुज़र फरमाओ और अल्लाह पर भरोसा रखो और अल्लाह बस है कारसाज़।

(सूरह अहज़ाब (33) : 48)


जिसने अपने नफ़्स को पाक रखा वो मुराद को पोहचा, और जिसने उसे खाक में मिला दिया वो खसरे में रहा।

(अल शम्स : 9, 10)


दोज़ख के लोग जन्नत वालो को पुकारेंगे के कुछ थोड़ा सा पानी हम पर दाल दो या जो रिज़्क़ अल्लाह ने तुम्हे दिया है उस ही में से कुछ फ़ेंक दो,
वो जवाब देंगे अल्लाह ने ये दोनों चीज़ें उन मुन्किरिने हक़ पर हराम कर दी हैं,
जिन्होंने अपने दीं को खेल और तफरीह बना लिया था और जिन्हे दुनिया की ज़िन्दगी ने फरेब मैं मुक़्तल कर रखा था।

(सूरह अल-अरफ़ रूकूह : 06)


और जिसे अल्लाह राह दिखाना चाहे उसका सीना इस्लाम के लिए खोल देता है,

(सूरह अनआम (6) : 125)


और तुझे क्या मालूम के ऐसी आग क्या होगी,
वो अल्लाह की सुलगाई हुई आग होगी जो दिलों पर चढ़ते चली जाएगी

(हमज़ा : 5-7)


अपने रब से दुआ करो गिड़ गिड़ाते और आहिस्ता, बेशक हद से बढ़ने वाले उसे पसंद नहीं। और ज़मीं में फसाद न फैलाओ।

(सूरह अराफ़ (7) : 55 56)


वह जो नमाज़ कायम रखे और हमारे दिए से कुछ हमारी राह में खर्च करे।
यही सच्चे मुसलमान हैं।

(सूरह अनफाल (8) : 3-4)


अपने रब से दुआ करो गिड़ गिड़ाते और आहिस्ता, बेशक हद से बढ़ने वाले उसे पसंद नहीं।
और ज़मीं में फसाद न फैलाओ।

(सूरह अराफ़ (7) : 55 56)


अल्लाह और उसके फ़रिश्ते सर्कार पर दरूद भेजते हैं मोमिनो तुम भी इन पर दरूद भेजो और खूब सलाम भेजा करो

(क़ुरआन 33 : 56)


ऐ ईमान वालों, अल्लाह और उसके रसूल का हुक्म मानो, और सुन-सुन कर उस से न फिरो
और उन जैसे न होना जिन्हों ने कहा हमने सुना और नहीं सुनते,
बेशक सब जानवरों में बदतर अल्लाह के नज़दीक वह है जो बेहरे गूंगे हैं,
जिनको अकाल नहीं।

(सूरह अनफाल : 22)


और जो अल्लाह पर भरोसा करे तो वह उसे काफी है।

(सूरह तलाक : 3)


करीब है अल्लाह दुश्वारी के बाद आसानी फ़रमा देगा।

(सूरह तलाक : 7)


मर्द अफसर है औरतों पर इसलिए के अल्लाह ने उनमे एक को दूसरे पर फ़ज़ीलत दी
और इसलिए के मर्दों ने उनपर अपने माल खर्च किये।

(सूरह (4) : 34)


जिस दिन साक खोली जायेगी और सजदे को बुलाये जाएंगे तो न कर सकेंगे,
नीची निगाहें किये हुए उन पर खवारी चढ़ रही होगी और बेशक दुनिआ में सजदे के लिए बुलाये जाते थे जब तंदुरस्त थे
तो जो इस बात को झुठलाता है उसे मुझपर छोड़ दो करीब है के हम उन्हें आहिस्ता आहिस्ता ले जाएंगे
जहांसे उन्हें खबर न होगी, और में उन्हें ढील दूंगा बेशक मेरी खुफ़िआ तदबीर बहोत पक्की है।

(सूरह कलम (68): 42 – 45)


और अल्लाह ज़रूर ज़ाहिर कर देगा ईमान वालों को, और ज़रूर ज़ाहिर कर देगा मुनाफ़िक़ों को।

(सूरह अंकबूत (29): 11)


और जो अल्लाह और उसके रसूल और मुसलमानों को अपना दोस्त बनाए तो बेशक अल्लाह ही का गिरोह ग़ालिब है

(सूरह माइदह : 56)


ऐ मेहबूब तुम पहले जिस क़िब्ले पर थे हमने वो इसी लिए मुक़र्रर किया था के देखें कौन रसूल की पैरवी करता है
और कौन उलटे पाऊं फिर जाता है।

(सूरह बक्राह (सौराह.1, पारा.2): 143)


तो ए मेहबूब (सलल्लाहु अलैहि वसल्लम) तुम्हारे रब की कसम! वो मुसलमान न होंगे जब तक अपने आपस के जगदेमे तुम्हे हाकिम न बनाये

(सूरह निसा : 65)


और तुम्हारे रब के लश्कर को उसके सिवा कोई नहीं जानता

(सूरह मुदस्सिर (74) : 34)


बेशक अल्लाह (अज़्ज़वजल) किसी कौम से अपनी नेअमत नहीं बदलता जबतक वो खुद अपनी हालत न बदले

(सूरह रआद (सौराह न०.13, पारा न०.13): 11)


फिर जब आएगी वो कान फाड़ने वाली चिन्धड़, उस दिन आदमी भागेगा अपने भाई और माँ और बाप और जोरू और बेटो से,
उसमे हर एक को उस दिन एक फिक्र है के वही उसे बस है, कितने मुँह (face) उस दिन रोशन होंगे हस्ते खुशियां मनाते
और कितने मूहों पर उस दिन गार्ड पड़ी होगी, उनपर शियाही चढ़ रही है, ये वही है काफिर बदकार।

(सूरह अबास : 33-42)


और कोई किसी की ग़ीबत भी न किया कराय, क्या तुम में से कोई इस बात को पसंद करेगा के अपने मारे हुए भाई का गोश्त खाये,
उससे तो तुम नफरत करते हो।

(सूरह-ए-हुजरा अत : आयत 12)


और जिस दिन ज़ालिम अपने हाथ चबा चबा लेंगे, के हाय किसी तरहसे मैंने रसूल के साथ राह ली होती,
वायेहराबी मेरी हाय किसी तरह मैंने फुलाने को दोस्त न बनाया होता बेशक उसने मुझे बहका दिया मेरे पास आई हुए नसीहतों से।

(सूरह फुरकान : 29)


जिस चीज़ का तुम्हे यकीं न हो उसके पीछे न पड़ा करो क्योंकि क़यामत के दिन कान, आँख और दिल से यक़ीनन सवाल होंगे।

(क़ुरआन 17:36)


बेशक अल्लाह के यहाँ तुम में ज़्यादा इज़्ज़त वाला वह जो तुममे ज़्यादा परहेज़गार है।

(सूरह हुजुरत : 13)


हरगिज़ काम न आएंगे तुम्हे तुम्हारे रिस्तें और तुम्हारी औलाद क़यामत के दिन तुम्हे उनसे अलग कर देगा और अल्लाह तुम्हारे काम देख रहा है

(सूरह मुमतहीन :2)


ऐ ईमानवालों, अपनी आवाज़ें ऊँची न करो उस गायब बताने वाले (नबी) की आवाज़ से
और उनके हुज़ूर बात चिल्लाकर न कहो जैसे आपस में एक दूसरे के सामने चिल्लाते हो के कही तुम्हारे अमल अकारत न हो जायें
और तुम्हे खबर न हो।

(सूरह हुजुरअत (पारा-26, रुकू-13) : आयात 2)


और मुसलमान औरतों को हुक्म दो अपनी निगाहें कुछ नीची रखे
और अपनी पारसाई की हिफाज़त करे और अपने बनाओ न दिखाए मगर जितना खुद ही ज़ाहिर है
और दुपट्टे अपने गरेबानों पर डाले रहे और अपना सिंगार ज़ाहिर न करें।

(सूरह नूर (24): 31)


और जिन्हों ने हमारी राह में कोशिश की, ज़रूर हम उन्हें अपने रास्ते दिखा देंगे और बेसक अल्लाह नेकों के साथ है।

(सूरह अंकबूत (29) : 69)


और कहते है हम ईमान लाये अल्लाह और रसूल पर और हुक्म माना फिर कुछ उनमे के उसके बाद फिर जाते है,
और वह मुसलमान नहीं, और जब बुलाये जाये अल्लाह और उसके रसूल की तरफ के रसूल उनमे फैसला फरमाये
तो जभी उनका एक फरिक मुँह फैर जाता है।

(सूरह नूर : 50)


बेशक मुनाफ़िक़ लोग अपने गुमान में अल्लाह को फरेब दिया चाहते है,
और वही उन्हें गाफिल करके मारेगा और जब नमाज़ को खड़े हो,
तो हारेजी से, लोगो को दिखावा करते है और अल्लाह को याद नहीं करते मगर थोड़ा,
बीचमे डगमग रहे हैं, ” न इधर का न उधर के।

(सूरह निसा : 143)


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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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