रोज़े में वह काम जिस से रोज़ा मकरूह नहीं होता

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Roze me woh kaam jis se roza makrooh Nahi hota
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Roze me woh kaam jis se roza makrooh Nahi hota

रोज़े में वह काम जिस से रोज़ा मकरूह नहीं होता

1- रोज़े की हालत में भूल चूक से कुछ खा पी लेने से न रोज़ा टूटता है न मखरूह होता है।

हज़रात अबू हुरैरा (रज़िअल्लाहु अन्हा)
नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से रिवायत करते हैं के
नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया”
जब कोई भूल कर खा पी ले तो अपना रोज़ा पूरा करें,
कियोंकि इसे अल्लाह ने खिलाया पिलाया हे”

(सहीह भुखारी मुक्तसर vol. 940)

2- मिस्वाक करने से रोज़ा मखरूह नहीं होता।

हज़रात आमिर बिन राबिया (रज़िअल्लाहु अन्हा) से रिवायत है
मैं नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को रोज़े की हालत में इतनी मर्तबा मिस्वाक करते देखा है
के गिन नहीं सकता”

(सहीह बुखारी किताबुस सोम बाब मिस्वाक)

3- रोज़े की हालत में गर्मी की शिद्दत से सर के ऊपर पानी बहाने से रोज़ा मखरूह नहीं होता।

हज़रात अबू बकर बिन अंदुररहमान कहते हैं
नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के असहाब में से एक सहाबी ने कहा
“मैं ने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को देखा के
नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) रोज़े में गर्मी या पियास की वजह से सर पर पानी बहा रहे थे”

(हदीस सही सुनन अबू दाऊद-2082)

4- रोज़े की हालत में सोते हुए या जागते हुए माज़ी ख़ारिज हो या एह्तिलाम (night fall) हो जाये तो न रोज़ा टूटता है न मखरूह होता है,

हज़रात अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़िअल्लाहु अन्हा) और हज़रत अकरामा (रज़िअल्लाहु अन्हा) फरमाते हैं
“रोज़ा किसी चीज़ के जिस्म में दाखिल (entry) होने से टूटता है
जिस्म से ख़ारिज (release) होने से नहीं टूटता”

(सहीह बुखारी-किताब सोम)

**जान बुझ के कोई रोज़े की हालत में माज़ी या मणि निकले तो इस से रोज़ा भी टूट जाता है और उस रोज़े की क़ज़ा और कुफ़्फ़ारा भी अदा करना होगा और अल्लाह से तौबा करनी होगी**

5- सर में तेल (oil) लगाने, खानगी (comb) करने या आँखों में सुरमा लगाने से रोज़ा मखरूह नहीं होता।

6- हंडिया (जिस बर्तन में खाना पक रहा हो) उसे चखने से, थूक निगलना, मख्खी (bee) के हलक़ में चले जाने से रोज़ा मखरूह नहीं होता।

7- रोज़ा दर गर्मी की शिद्दत में कपड़ा पानी से गिला कर क बदन पे रख सकता हे इस से रोज़ा मखरूह नहीं होता।

(Point 5, 6 and 7 from हदीस सहीह बुखारी चैप्टर सीएम)

8- अगर किसी पर गुसल फ़र्ज़ हो, लेकिन देर से उठे, तो सेहरी खा कर गुसल कर सकता है अलबत्ता खाने से पहले वज़ू कर लेना चाहिए।

हज़रात अबू बकर बिन अब्दुर्रहमान (रज़िअल्लाहु अन्हा) से रिवायत है के
मैं और मेरे वालिद हज़रात आयशा (रज़िअल्लाहु अन्हा) के पास आये.
हज़रात आयशा (रज़िअल्लाहु अन्हा) ने बयान किया
“मैं गवाही देती हूँ रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) एह्तिलाम के सबब से नहीं
बल्कि जिमा के सबब से हालत जनाबत में सुबह करते
और (गुसल किये बगैर) रोज़ा रखते (बाद में नमाज़ फ़जर से पहले गुसल फरमाते)
फिर हम दोनों हज़रात उम्मे सलमा (रज़िअल्लाहु अन्हा) के पास आये और उन्हों ने भी यही बात कही”

(सहीह बुखारी बाब इतेसालुस सयम)

रमजान में रात जिमा के बाद शौहर और बीवी लेट उठे और बिना गुसल की हालत में सिर्फ वज़ू कर शहरी खा सकते हैं
पर फ़जर की नमाज़ से पहले गुसल कर नमाज़ पढ़ सकते हैं उन का रोज़ा दुरुस्त होगा।

9- रोज़े की हालत में बीवी का बोसा (kiss) लेना जायज़ है पर शर्त है जज़्बात पर काबू हो

हज़रात उम्र (रज़िअल्लाहु अन्हा) से रिवायत है के
फरमाते हे एक रोज़ मेरा जी चाहा और मैंने रोज़े की हालत में अपनी बीवी का बोसा ले लिया।
फिर में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की खिदमत में आया
अर्ज़ किया
“आज में ने बड़ा गलत काम किया है”
रोज़े की हालत में अपनी बीवी को बोसा ले लिया”

रसूलअल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया”
अच्छा बताओ अगर तुम रोज़े की हालत में कुल्ली कर लो तो फिर?
मेने अर्ज़ किया कुल्ली में किया हर्ज़ हे।
नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया फिर किस चीज़ में हर्ज़ है?
“यानि बोसा लेने में कोई हर्ज़ नहीं।

(हदीस सहीह सुनन अबू दाऊद और मुसनद अहमद)

10- रोज़े की हालत में पिछने* लगवाना जायज़ है

हज़रात अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़िअल्लाहु अन्हा) ने फ़रमाया है
नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने रोज़े की हालत में पिछने* लगवाई”

(मुख़्तसर सहीह बुखारी-942)

*इलाज की तोर पर सोइ (niddle), ब्लेड या उस्तरे के साथ जिस्म की किसी हिस्से से खून निकलने को पिछने या सिंघी लगवाना कहते हैं।
आज के मॉडर्न टेक्नोलॉजी में इसे cupping treatment कहते है।

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