सदक़ा का बयान तफ़्सीर से ज़रूर पढ़ें

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Sadqa Ka Bayan Tafseer se
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Sadqa Ka Bayan Tafseer se

सदक़ा का बयान तफ़्सीर से ज़रूर पढ़ें

क़ुरान:

2 सौराह अल-बक़रह, आयत 254 :

ए ईमान वालो जो कुछ हम ने तुम्हे अता किया है उस में से (अल्लाह की राह में नेक काम में) खर्च करो.

57 सौराह अल-हदीद, आयत 18:

बेशक सदक़ा देने वाले मर्द और सदक़ा देने वाली औरते और जिन्हो ने (अल्लाह के लिए नेक काम में खर्च करके) अल्लाह को क़र्ज़ ए हसन के तौर पर क़र्ज़ दिया उन के लिए (इस का सवाब) कई गुना बढ़ा दिया जाएगा और उन के लिए (इस का) बेहतरीन अज्र होगा.

हदीस ए नबवी:

(1) हज़रते अस्मा बिन्त अबू बक्र सिद्दीक़ रदी-अल्लाहु तआला अन्हा से रिवायत है की:
हुज़ूर रसूल-अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया
‘माल को थैली में बन्द करके न रखना वरना अल्लाह तआला भी उस के ख़ज़ाने में तुम्हारे लिए बंदिश लगा देगा, जहा तक हो सके लोगो में खैरात तक़सीम किया करो’।

(सहीह बुखारी, जिल्द -2, हदीस -1434)

(2) खैरात को मत रोको वरना तुम्हारा रिज़्क़ भी रोक दिया जाएगा,

(बुखारी)

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सदक़ा का माना है के अल्लाह तआला की इबादत की लिए अपने माल में से फ़क़ीरों और मोहताजों को मदद करना.

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सदक़ा की क़िस्में:
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(1) फ़र्ज़:

ज़कात – माह ए रमज़ान में साहिब ए निसाब पर फ़र्ज़ है.

(2) वाजिब:

सदक़ा ए फ़ित्र – माह ए रमज़ान में साहिब ए निसाब पर वाजिब है.
सदक़ा ए नज़र – अगर सदक़े की मन्नत मानी तो मन्नत पूरी होने पर (काम हो जाने पर) सदक़े करना वाजिब है।
कफ़्फ़ारा –

[1] क़सम तोड़ने पर,

[2] हालत ए एहराम में कोई सग़ीरा गलती होने पर सदक़ा देना वाजिब है.

[3] माह ए रमज़ान के फ़र्ज़ रोज़ा क़ज़ा हो जाने पर, (अगर एक फ़र्ज़ रोज़े के बदले लगातार 60 रोज़े नहीं रख सकता तो 60 मिस्कीनों को एक दिन के लिए दोनों वक़्त भर पेट खाना खिलाना होगा)

(3) सुन्नत व मुस्तहब :

सदक़ा ए Haajat – कोई हाजत पेश आने पर या मुसीबत या बीमारी या हादसा आने पर;
सदक़ा ए शुक्र – कोई नेअमत मिलने पर या सेहत मिलने पर या कोई काम पूरा होने पर;
कोई कारोबार शुरू करते वक़्त;
सफर शुरू करने से पहले और सफर से लौटने के बाद;

(4) नफ़्ल सदक़ा (खैरात).

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सदक़ा की फ़ज़ीलत:
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सदक़ा अल्लाह तआला के ग़ज़ब को काम करता है.
सदक़ा दुनिया और आख़िरत में फायदा पहुंचाता है.
सदक़ा जो मुसीबतें आई हो और जो आने वाली हो उन्हें ताल देता है.
सदक़ा बुरी मौत से बचाता है.
सदक़ा क़ब्र में अज़ाब से बचाता है.
सदक़ा रोज़ ए महशर साया बनकर हिफाज़त करेगा.
सदक़ा जहन्नम की आग को ठंडा करेगा.

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हदीस ए नबवी :

जो शख्स हराम तरीके से माल जमा कर के सदक़ा करे, उस को उस सदक़े का कोई सवाब नहीं मिलेगा, बल्कि उस हराम कमाई का वबाल उस पर है.

(Mustadrak, Hadees -1440)

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सदक़ा के मुता’अल्लिक़ चंद ख़ास बातें:
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(1) सदक़ा करने में अल्लाह तआला की रज़ा की निय्यत होनी चाहिए, रिया (दिखावा) या सुम्मा (शोहरत की लालच) नहीं होना चाहिए. और सदक़ा के बाद इस पर तकब्बुर (गुरूर) भी नहीं करना चाहिए. बल्कि अल्लाह तआला का शुक्र अदा करना चाहिए के उस की अता की गई ने’अमत से हमे सदक़ा करने का मौक़ा और तौफ़ीक़ अता फ़रमाई.

(2) ज़कात और सदक़ा ए फ़ित्र ज़ाहिरी तौर पर अदा करना चाहिए जिस से किसी को ये गलत फेहमी न हो ये साहिब ए निसाब हो कर भी ज़कात और सदक़ा ए फ़ित्र अदा नहीं करता.
और दूसरे सदक़े छिपाकर (मख़फ़ी) करें ताके किसी को रिया या तकब्बुर का शक न हो.

(3) सदक़ा हलाल माल में से करना चाहिए. हराम तरीके से कमाई हुए माल में से सदक़ा करने से सवाब नहीं मिलेगा बल्कि उस हराम कमाई का वबाल होगा .

(4) अवाम में जो गलत फेहमी है के सदक़े में कुछ ख़ास चीज़ ही दे सकते हैं यानी चावल, अंदा या मुर्गी, ये सही नहीं है.

सदक़े में माल (रक़म) दे सकते हैं और इस के इलावा गल्ला (आनाj) देना या खाने की कोई चीज़ देना (पका हुआ खाना देना बेहतर है) या कपडे या और कोई ज़रुरत की चीज़ देना (जैसे ठंडी के मौसम में कम्बल दे सकते हैं) या बीमार के लिए दवा-इलाज का इंतज़ाम करना या किसी को रहने के लिए मकान बना देना ये सब भी सदक़ा में शामिल है.

(5) सदक़ा फ़क़ीर, मिस्कीन (जिस के पास कुछ भी नहीं यहाँ तक के खाने के लिए खाना और पहनने के लिए कपडे भी नहीं), मोहताज, मदयूं (देनदार), इब्न उस सबील (यानी मुसाफिर जिस के पास सफर के दौरान माल न रहा तो वो उस की ज़रुरत जितना माल ले सकता है अगरचे घर पर माल मौजूद हो) को ही दिया जा सकता है.

बेवाओं और यतीमो को भी देना बेहतर है.

इसी तरह फी सबीलिल्लाह – राह ए खुदा में खर्च कर सकते हैं यानी तालिब ए इल्म को इल्म ए दीन सिखने के लिए या जिहाद में जाने वाले को (अगर उस के पास सामन न हो तो) दे सकते हैं.

(6) अगर खुद के रिश्तेदार (भाई, बहन, चाचा, फूफी, मामू, खाला और इन की औलाद) मोहताज हैं तो सदक़ा के सब से पहले हक़दार वो हैं, फिर मोहल्ले वाले, फिर गाँव या शहर वाले. क्यों की अल्लाह तआला उस सदक़े को क़ुबूल नहीं फरमाता जो मोहताज रिश्तेदारों को देने के बजाय घेरो को दिया जाए.

(7) अगर पता हो के ये शख्स सदक़े का इस्तेमाल हराम काम में (शराब, जीना, जुवा, वगैरह में) करेगा तो उसे सदक़ा देना मन है क्यों की ये सदक़ा जाया करना है.
इसी तरह वो शख्स जो खुद कमा सकता है मगर कमाना नहीं चाहता यानी सदक़ा खाने की आदत हो गई है या भिक मांगने को पाशा बना लिया है उसे सदक़ा देना मन है.
Faisal Khan
(8) सही तंदुरस्त को इमदाद के लिए सदक़ा दे सकते हैं अगरचे कमाने की क़ुदरत रखता हो. मगर उस शख्स के लिए सवाल करना जाइज़ नहीं यानी वो मांग नहीं सकता.

(9) अहले बाइट (बानी हाशिम) को सदक़ा नहीं दे सकते, उन्हें सिर्फ हदिया दे सकते हैं.

(10) हर्बी काफिर को किसी क़िस्म का सदक़ा देना मन है मगर जिम्मी काफिर को नफ़्ल सदक़ा (khairaat) दे सकते हैं अगर वो मोहताज हो.
बाद-मज़हब (जो निफ़ाक़ की वजह से कुफ्र तक पहुँच गए हैं उन) को भी सदक़ा देना माना है.

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सदक़ा ए हुकमी :
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हदीस ए नबवी:

सब से अफ़ज़ल बेहतरीन सदक़ा ये है के कोई मुसलमान इल्म सीखे, फिर अपने मुसलमान भाई को सीखा दे.

(इब्ने माजाह)

माल के इलावा अल्लाह की अता की हुई और नेअमतें दूसरे की मदद के लिए इस्तेमाल करने से सदक़ा का सवाब मिलता है.

(1) इल्म – किसी भी बात का इल्म हासिल किया हो वो दूसरे को सिखाकर तालीम व तरबियत करना यानी क़ुरान मजीद सिखाना, हदीस शरीफ सिखाना, दीनी मसाइल सिखाना, वुज़ू और ग़ुस्ल का तरीक़ा, नमाज़, रोज़ा, ज़कात, हज, उमराह, तवाफ़, क़ुर्बानी वगैरह का तरीक़ा सिखाना या कोई दुआ सिखाना.
इसी तरह नेकी का हुक्म देने में और बुराई से रोकने में भी सदक़े का सवाब है.

(2) फैन या हुन्नर – किसी को कोई फैन या हुन्नर सिखाना या हलाल रोज़गार का रास्ता सिखाना.

(3) इमदाद –

किसी कमज़ोर या माज़ूर को बोझ उठाने में मदद करना.
या कोई काम पूरा करने में मदद करना.
किसी ज़ालिम से या कोई दरिंदे या जानवर से किसी की हिफाज़त करना.
किसi को सही रास्ता दिखाना.
किसी को सही मश्वरा देना.
किसी को मुसीबत में तसल्ली और हौसला देना.
या उस के लिए दुआ ए खैर करना.
क़र्ज़दार को क़र्ज़ अदा करने में मोहलत देना.

4) किसी के दरमियान सुलह करा देना.

(5) ख़ुशी के मौके पर या कामयाबी पर मुबारकबाद देना और ख़ुशी में शामिल होना.
किसी को सलाम करके या सलाम का जवाब देकर या मुस्कुराकर या बात करके या इज़ात देकर खुश करना.

(6) रास्ते से तकलीफ देने वाली चीज़ को दूर करना.
रास्ते से गुजरने वाले को तकलीफ न हो इस लिए रौशनी करना.

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सदक़ा ए जारिया :
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हदीस ए नबवी :

(1) मोमिन को उस के अमल और नेकियों से मरने के बाद भी ये चीज़ें पहुँचती रहती हैं:
इल्म जिस की उस ने तालीम दी और इशाअत की और औलाद ए सालेह जिसे छोड़ गया है या मुशफ (क़ुरान मजीद) जिसे मीरास में छोड़ा या मस्जिद बनाई या मुसाफिर के लिए मकान बना दिया या नहर जारी कर दी या अपनी सेहत और ज़िन्दगी में अपने माल में से सदक़ा निकाल दिया जो उस के मरने के बाद उस को मिलेगा.
(इब्ने माजाह;)
दरमी)

(2) हज़रात अबू हुरैरा रज़ि-अल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है की:
हुज़ूर रसूल-अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया
‘इंसान जब मर jaata है तो उस के aamaal khatm हो jaate हैं (rook jaate हैं), मगर 3 चीज़ें baaqi रहती हैं:
[1] सदक़ा ए जारिया,
[2] इल्म जिस से लोग फायदा उठायें,
[3] नेक औलाद जो वालिदैन के लिए दुआ ए मग़फ़िरत करे.

सदक़ा ए जारिया वो अमल है जिस को एक बार करने के बाद उस का सवाब इंसान को उस की ज़िन्दगी में भी मिलता रहता है और आख़िरत में (क़ब्र में और महशर में) भी मिलता रहता है जब तक वो चीज़ मौजूद रहती है.

सदक़ा ए जारिया में 3 चीज़ें शामिल हैं:

(1) सदक़ा ए जारिया –

लोगो के लिए पानी का इंतज़ाम करना यानी कुआँ खुदवाकर वक़फ कर देना, नहर जारी करवाना, पानी के लिए सबील बनाना;
ग़रीबो के लिए खाने का इंतज़ाम करना (Langar);

मुसाफिर-खाना (सारा) बनाना;

कोई पेड़ (दरख़्त) लगाना जिस के साये से और दूसरी चीज़ो से लोगो को फायदा मिले;
हस्पताल या दवाखाना के इंतज़ाम करना.
मस्जिद की तामीर में हिस्सा लेना.

[2] इल्म जिस से लोग फायदा उठायें,

किसी तालीम ए दीन करना यानी किसी को क़ुरान मजीद सिखाया हो, हदीस का दरस दिया हो या कोई दीनी मसाइल सिखाया हो;
किसी को क़ुरान मजीद या दीनी किताब का हदिया देना;
मदरसा की तामीर में हिस्सा लेना.

[3] नेक औलाद –

जो वालिदैन के लिए दुआ ए मग़फ़िरत करे या इसाल ए सवाब करे.

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अल्लाह तआला उस के हबीब सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सदक़े में

सब को मुकम्मल इश्क़ ए रसूल अता फरमाए और सब के ईमान की हिफाज़त फरमाए और सब को नेक अमल करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए और सब को सदक़ा करके उस के फयूज़ ओ बरकात हासिल करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए.

और इन बातो को याद रखकर अमल करने की और दुसरो को बताने की तौफ़ीक़ अता फरमाए.

और सब को दुनिया व आख़िरत में कामयाबी अता फरमाए और सब की नेक जाइज़ मुरादों को पूरी फरमाए.

आमीन.

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अल्लाह तआला रब्बुल अज़ीम हम सब मुसलमान भाइयों को कहने, सुनने और सिर्फ पढ़ने से ज्यादा अमल करने की तौफीक अता फ़रमाये और हमारे रसूल  नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बताई हुई सुन्नतों और उनके बताये हुए रास्ते पर हम सबको चलने की तौफीक अता फ़रमाये (आमीन)।

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